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आपदा में हेलीकॉप्टर के कुछ रोचक किस्से
वेद विलास उनियाल
Updated Mon, 24 Jun 2013 06:03 PM IST
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उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की दो अलग-अलग जगह जोलीग्रांट और सहस्त्रधारा से हेलीकॉप्टर उड़ान भर रहे हैं। मगर ऐसे कठिन समय में हेलीकॉप्टर का उपयोग किस अंदाज में हो जाता है, इसकी कहानी भी अजब है।
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एक माननीय जब सहस्त्रधारा में पहुंचे, तो उन्हें पता लगा कि उनका बैग तो जोलीग्रांट में ही रह गया है। उनके सामने क्या दिक्कत थी, किसी स्कूटर की तरह हेलीकॉप्टर वापस हो गया। गनीमत रही कि उड़ान पांच दस मिनट की ही थी। अगर लंबी दूरी की होती तो क्या फर्क हो जाता, आखिर हेलीकाप्टर जो उनके पास है।
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यह मत समझिए कि हर व्यवसायिक कंपनी का दिल इस गंभीर विप्पति के समय पसीज गया है। कुछ व्यवसायिक कंपनियों को तो यह जेब गर्म करने का बेहतर अवसर मिला है। लिहाजा लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाने के एवज में पैसा भी लिया गया। पैसा भी इतना कि गरीब और आम आदमी तो ऐसी हवाई यात्रा के नाम से ही डर जाए।
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पहले जहाज साफ तो करो
पायलट ने कहा, देर करना ठीक नहीं, मौसम अभी सुधरा है, चलना चाहिए, पर नेताजी कहां मानने वाले थे। सुबह सुबह कार चमकाने की आदत है, इसलिए हेलीकॉप्टर भी चमकना चाहिए। कहने लगे इस हेलीकॉप्टर का हाल देखो, कितना गंदा हो रहा है।
किसी ने कहा, अंदर ठीक है। पर नेताजी, अपनी ठसक में ही रहे। पता नहीं उसके बाद हेलीकॉप्टर किस तरह उड़ा, लेकिन हेलीकॉप्टर में थोड़ी धूल बर्दाश्त न करने वाले नेताजी ने आपदा ग्रस्त क्षेत्र में लोगों की किस तरह मदद की होगी, समझा जा सकता है।
कुछ लोगों के लिए अजूबा है हेलीकॉप्टर
रुद्रप्रयाग के पास एक सज्जन बता रहे थे, भाई 71 के युद्ध के समय भी नहीं देखे थे ऐसे हेलीकॉप्टर। हेलीकॉप्टरों की इतनी आवाजाही इससे पहले कभी नहीं देखी। कुछ गांव वालों के लिए तो आम दिन की बस की तरह हो गए ये हेलीकॉप्टर।
हेलीकॉप्टर में पहली बार बैठे एक व्यक्ति का कहना था, सच कहिए तो मुझे बहुत खुश होना चाहिए था कि पहली बार हेलीकॉप्टर में बैठा, पर यह दुर्भाग्य है कि ऐसे समय में इसमें बैठने को मिला। इसका जरा भी रोमांच नहीं था कि हेलीकॉप्टर में हूं। अच्छा तो यह लगा कि जिंदगी किसी तरह बच गई।
पीए भी, पत्नी भी, दोस्त भी
कुछ प्रभावी लोगों के हाथ में प्रभाव था, तो पत्नी को भी सफर में ले गए। कुछ अपने पीए को ले जाने की जिद् करने लगे। कुछ को लगा कि अकेले ही सफर कैसे हो। दोस्त भी तो चाहिए। इसलिए हेलीकॉप्टर को लेकर भी खूब गणित होता रहा।
प्लीज आप नहीं, फंलाने साहब जाएंगे
एक रुतबे वाले मंत्री को पूरा भरोसा था कि किसी हेलीकॉप्टर में उन्हें जाना ही है। लिहाजा समय पर वह सहस्त्रधारा में आ गए। पूरे तामझाम के साथ जैसे ही हेलीकॉप्टर के पास आए, पायलट ने रोका।
उन्होंने आश्चर्य जताया कि उन्हें इसमें जाना है। पायलट ने बड़ी विनम्रता से कहा, सर आप नहीं, फंला सर को जाना है। मंत्रीजी समझ गए कि इन दिनों फंला सर का रुतबा किस तरह का है। अमूमन अपनी हर बात मनवाने वाले मंत्रीजी चुपचाप वापस चले जाए।
मोदीजी के साथ कौन-कौन जाएंगे
जिस दिन मोदी को आना था, मीडिया में इस बात को लेकर खासी सुगबुगाहट थी कि केदारनाथ में उनके साथ भाजपा का कौन नेता जाएगा। डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, वीसी खंडूरी, कोश्यारी हर नेता को लेकर कयास ही लग रहे थे।
दिल्ली में एक पत्रिका के रिपोर्टर तो डॉ. निशंक के आवास पर ही आ गए और पूछा, सर क्या आप जाएंगे मोदी के साथ। निशंक ने कहा, देखिए कल केदारनाथ से आया हूं, देखते हैं। रिपोर्टर ने फिर कहा, सर मोदीजी से मेरा नाम ले लिजिएगा। वो मुझे जानते हैं। मैं भी साथ चलना चाहता हूं। पता नहीं डॉ निशंक ने मोदी को बताया या नहीं, पर मोदी से उनका नाम कहने का आश्वासन जरूर दिया।
सेना के जहाजों को सलाम
सेना के हेलीकॉप्टर जहां से भी गुजरे, लोगों ने उन्हें सलाम किया। बच्चे भी पहचानने लगे कि अमूक हेलीकॉप्टर किसी व्यवसायिक कंपनी का है, या सेना का। जैसे ही उन्हें सेना का जहाज नजर आता, वह हाथ हिलाकर उनका अभिवादन करते। बच्चे अपनी तरह उस हेलीकॉप्टर को सलाम करते।