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घाटे से उबरा टीडीसी, जल्द लौटेंगे सुनहरे दिन
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हल्दी स्थित टीडीसी मुख्यालय।
- फोटो : RUDRAPUR
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उत्तराखंड बीज एवं तराई विकास निगम (टीडीसी) अब घाटे से उबर गया है। पिछले शुक्रवार को कृषि मंत्री सुबोध उनियाल की अध्यक्षता में संपन्न हुई टीडीसी की बोर्ड बैठक में इसका लेखाजोखा प्रस्तुत किया गया।
लगातार तीन वर्ष तक बीजों की आपूर्ति करने वाले अंशधारी किसानों सहित बेहतर कार्य करने वाले कर्मियों को घाटे से उबारने के लिए प्रोत्साहन राशि देने का निर्णय लिया गया। वहीं, कार्य से जी चुराने वाले कर्मियों को चिन्हित करने के लिए एक कमेटी का भी गठन किया गया है।
टीडीसी के कार्यवाहक एमडी, महाप्रबंधक और मुख्य कृषि अधिकारी डॉ. अभय सक्सेना ने बताया कि गुणवत्तायुक्त बीजों की उपलब्धता के लिए टीडीसी और एनएससी के बीच बेहतर समन्वय के लएि समिति का गठन किया गया है। पिछले दो तीन वर्षों से टीडीसी करीब 55 करोड़ रुपये घाटे में चल रहा था।
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अब आगामी सीजन के लिए 50 हजार क्विंटल गेहूं बीजों की उपलब्धता के लिए रणनीति बनाई गई है। जल्द कर्मियों के लंबित वेतन और डीए के एरियर का भी भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा। जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय का अभिन्न अंग रहा टीडीसी 1969 में पंतनगर विवि से अलग होकर अस्तित्व में आया। 2016 में टीडीसी में हुए 16 करोड़ रुपये के घोटाले के बाद से यह लगातार घाटे में रहा।
हालात यहां तक पहुंच गए कि प्रबंधन के पास अपने कर्मियों को देने के लिए वेतन भी जुटाना मुश्किल हो गया। इसके बाद टीडीसी को दोबारा पंतनगर विवि में समाहित करने की भी कवायद शुरू हुई, लेकिन यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी। बतौर एमडी टीडीसी की कमान तत्कालीन डीएम डॉ. नीरज खैरवाल को सौंपी गई और महाप्रबंधक का प्रभार जिले के सीएओ डॉ. अभय सक्सेना को सौंपा गया। जिनके कार्यकाल में टीडीसी ने उत्तरोत्तर प्रगति की और अंशधारी किसानों का बकाया करोड़ों रुपये का भुगतान संभव हो सका। टीडीसी अब घाटे से उबरकर दोबारा मुनाफे की राह पर है।
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लगातार तीन वर्ष तक बीजों की आपूर्ति करने वाले अंशधारी किसानों सहित बेहतर कार्य करने वाले कर्मियों को घाटे से उबारने के लिए प्रोत्साहन राशि देने का निर्णय लिया गया। वहीं, कार्य से जी चुराने वाले कर्मियों को चिन्हित करने के लिए एक कमेटी का भी गठन किया गया है।
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टीडीसी के कार्यवाहक एमडी, महाप्रबंधक और मुख्य कृषि अधिकारी डॉ. अभय सक्सेना ने बताया कि गुणवत्तायुक्त बीजों की उपलब्धता के लिए टीडीसी और एनएससी के बीच बेहतर समन्वय के लएि समिति का गठन किया गया है। पिछले दो तीन वर्षों से टीडीसी करीब 55 करोड़ रुपये घाटे में चल रहा था।
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अब आगामी सीजन के लिए 50 हजार क्विंटल गेहूं बीजों की उपलब्धता के लिए रणनीति बनाई गई है। जल्द कर्मियों के लंबित वेतन और डीए के एरियर का भी भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा। जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय का अभिन्न अंग रहा टीडीसी 1969 में पंतनगर विवि से अलग होकर अस्तित्व में आया। 2016 में टीडीसी में हुए 16 करोड़ रुपये के घोटाले के बाद से यह लगातार घाटे में रहा।
हालात यहां तक पहुंच गए कि प्रबंधन के पास अपने कर्मियों को देने के लिए वेतन भी जुटाना मुश्किल हो गया। इसके बाद टीडीसी को दोबारा पंतनगर विवि में समाहित करने की भी कवायद शुरू हुई, लेकिन यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी। बतौर एमडी टीडीसी की कमान तत्कालीन डीएम डॉ. नीरज खैरवाल को सौंपी गई और महाप्रबंधक का प्रभार जिले के सीएओ डॉ. अभय सक्सेना को सौंपा गया। जिनके कार्यकाल में टीडीसी ने उत्तरोत्तर प्रगति की और अंशधारी किसानों का बकाया करोड़ों रुपये का भुगतान संभव हो सका। टीडीसी अब घाटे से उबरकर दोबारा मुनाफे की राह पर है।