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कठोर शिला को ओखली का रूप देने में जुटे बुजुर्ग

Mon, 09 Aug 2021 09:54 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Mon, 09 Aug 2021 09:54 PM IST
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Elders engaged in giving the hard rock the shape of an oak
गुप्तकाशी के नाला गांव में ओखली बनाते हुए वृद्घ फगुणु लाल। - फोटो : RUDRAPRYAG
उत्तराखंड की लोक संस्कृति का प्रतीक ओखली के संरक्षण के लिए ग्राम पंचायत नाला (कर्णधार) के फगुणु लाल (83) दिनरात एक कर रहे हैं। वे बरसात के मौसम में प्रतिदिन चार से पांच घंटे छेनी-हथौड़े से कठोर शिला को ओखली का रूप देने में लगे हुए हैं।
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बुजुर्गों के अनुसार गांवों में पहले धान की नई फसल तैयार होने पर अनाज को ओखली में कूटकर खीर बनाई जाती थी, जिसे देवी देवताओं को भोग रूप में चढ़ाया जाता था। वहीं, केदारघाटी के नाला गांव के बुजुर्ग फगुणु लाल का कहना है कि एक फीट गहरी व चार से छह इंच चौड़ी ओखली को तैयार करने में छह से आठ दिन का समय लग जता है। गढ़वाल विवि के समाजशास्त्र के प्रो. जय प्रकाश भट्ट का कहना है कि ओखली उत्तराखंड की सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है। भौतिकवाद के युग में भले ही इसका उपयोग सीमित हो गया है, लेकिन इसके महत्व को कम नहीं समझा जा सकता है। इसके संरक्षण के लिए नई पीढ़ी को भी आगे आने की जरूरत है। संवाद
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