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जुलूस से होता था नामाकंन, पता चलता था कितना है दम
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हजारों की भीड़, लाउडस्पीकर और झंडों से लैस गाड़ियों का रेला। गायकों की मंडली और नेताओं के जिंदाबाद के नारे। पूड़ी-सब्जी से लेकर लड्डुओं का पूरा इंतजाम.. विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा, कुछ वर्षों पहले तक नामांकन के दौरान घर से लेकर कलक्ट्रेट तक कुछ ऐसे नजारे होते थे। नामांकन के दौरान जुटने वाली भीड़ से ये अंदाजा लगा लिया जाता था कि किसमें कितना दम है, लेकिन अब ये शक्ति प्रदर्शन बीते दिनों की बात हो गई है। अब प्रत्याशी कुछ समर्थकों के साथ ही नामांकन कर चुनाव प्रचार में जुट जाते हैं।
वर्ष 2000 से पहले चुनाव की रंगत कुछ और होती थी। तब भी कलक्ट्रेट में पर्चा दाखिला होता था। चुनाव आयोग का डंडा तब भी चलता था। प्रत्याशियों के साथ नामांकन कराने जाने के लिए संख्या भी निर्धारित थी, लेकिन नेताओं के समर्थक कहां मानते थे। वे अपने नेताओं के साथ बड़ी संख्या में ढाले बाजे के साथ नामांकन कराने पहुंचते थे। कलक्ट्रेट परिसर में पुलिस की सख्ती के बाद भी समर्थक नहीं मानते थे। कलक्ट्रेट के बाहर गाड़ियां लगने से जाम लग जाता था। सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त कर्मचारी भगत सिंह रावत बताते हैं कि वर्ष 2000 के बाद चुनाव आयोग सख्त हुआ। इससे पहले तक कलक्ट्रेट नामांकन प्रक्रिया के दौरान प्रत्याशियों का शक्ति प्रदर्शन केंद्र होता था।
यहीं से जनता को पता चल जाता था कि किस प्रत्याशी में कितना दम है। सेवानिवृत्त कर्मचारी शिव कुमार शुक्ला बताते हैं कि प्रत्याशियों के घर से लेकर कलक्ट्रेट तक गाड़ियों का रेला उमड़ता था। नामांकन में समर्थकों की ऐसी भीड़ जुटती थी कि चुनावी माहौल बना देती थी। शंख, घंटे, घड़ियाल, लाउडस्पीकर और लोक गायकों की मंडली रहती थी। उस दौर की बात ही अलग थी। व्यवसायी कुलभूषण बताते हैं कि 80 के दशक में प्रत्याशियों के समर्थक, ट्रैक्टर-ट्रॉली, ट्रकों और बसों में भरकर कलक्ट्रेट आते थे। अंदर और बाहर समर्थकों का मेला सा लग जाता था। अब के माहौल को देखकर डर लगता है। पहले चुनावी प्रतिद्वंद्विता थी, लेकिन बैर नहीं था। अब ये सब नजर नहीं आता है। संवाद
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इस बार कोरोना का भी डर
इस विधानसभा चुनाव में कोरोना संक्रमण का भी डर बना हुआ है। प्रत्याशियों के समर्थक भी कम ही प्रचार में नजर आ रहे हैं। प्रत्याशियों को भी कोरोना के साथ चुनाव आयोग की कार्रवाई का डर सता रहा है। इसलिए वह कम समर्थकों के साथ चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं।
सोशल मीडिया बना बड़ा हथियार
आज के दौर प्रत्याशियों और समर्थकों के लिए चुनाव प्रचार के लिए सोशल मीडिया बड़ा हथियार बनकर सामने आया है। छोटे दल से लेकर बड़े दल के नेताओं के फेसबुक, व्हॉट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर समेत अन्य सोशल साइटों पर कई-कई अकाउंट बने हुए हैं। इन पर नेताओं की सोशल मीडिया की टीम लगातार प्रचार कर रही है।
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वर्ष 2000 से पहले चुनाव की रंगत कुछ और होती थी। तब भी कलक्ट्रेट में पर्चा दाखिला होता था। चुनाव आयोग का डंडा तब भी चलता था। प्रत्याशियों के साथ नामांकन कराने जाने के लिए संख्या भी निर्धारित थी, लेकिन नेताओं के समर्थक कहां मानते थे। वे अपने नेताओं के साथ बड़ी संख्या में ढाले बाजे के साथ नामांकन कराने पहुंचते थे। कलक्ट्रेट परिसर में पुलिस की सख्ती के बाद भी समर्थक नहीं मानते थे। कलक्ट्रेट के बाहर गाड़ियां लगने से जाम लग जाता था। सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त कर्मचारी भगत सिंह रावत बताते हैं कि वर्ष 2000 के बाद चुनाव आयोग सख्त हुआ। इससे पहले तक कलक्ट्रेट नामांकन प्रक्रिया के दौरान प्रत्याशियों का शक्ति प्रदर्शन केंद्र होता था।
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यहीं से जनता को पता चल जाता था कि किस प्रत्याशी में कितना दम है। सेवानिवृत्त कर्मचारी शिव कुमार शुक्ला बताते हैं कि प्रत्याशियों के घर से लेकर कलक्ट्रेट तक गाड़ियों का रेला उमड़ता था। नामांकन में समर्थकों की ऐसी भीड़ जुटती थी कि चुनावी माहौल बना देती थी। शंख, घंटे, घड़ियाल, लाउडस्पीकर और लोक गायकों की मंडली रहती थी। उस दौर की बात ही अलग थी। व्यवसायी कुलभूषण बताते हैं कि 80 के दशक में प्रत्याशियों के समर्थक, ट्रैक्टर-ट्रॉली, ट्रकों और बसों में भरकर कलक्ट्रेट आते थे। अंदर और बाहर समर्थकों का मेला सा लग जाता था। अब के माहौल को देखकर डर लगता है। पहले चुनावी प्रतिद्वंद्विता थी, लेकिन बैर नहीं था। अब ये सब नजर नहीं आता है। संवाद
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इस बार कोरोना का भी डर
इस विधानसभा चुनाव में कोरोना संक्रमण का भी डर बना हुआ है। प्रत्याशियों के समर्थक भी कम ही प्रचार में नजर आ रहे हैं। प्रत्याशियों को भी कोरोना के साथ चुनाव आयोग की कार्रवाई का डर सता रहा है। इसलिए वह कम समर्थकों के साथ चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं।
सोशल मीडिया बना बड़ा हथियार
आज के दौर प्रत्याशियों और समर्थकों के लिए चुनाव प्रचार के लिए सोशल मीडिया बड़ा हथियार बनकर सामने आया है। छोटे दल से लेकर बड़े दल के नेताओं के फेसबुक, व्हॉट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर समेत अन्य सोशल साइटों पर कई-कई अकाउंट बने हुए हैं। इन पर नेताओं की सोशल मीडिया की टीम लगातार प्रचार कर रही है।