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रुड़की के वैैैज्ञानिकों ने तराशी एशिया की सबसे बड़ी सुरंग
अमर उजाला रुड़की
Updated Thu, 06 Apr 2017 11:30 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो अप्रैल 2017 को जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले में एनएच-44 पर बनी एशिया की जिस सबसे लंबी (करीब 10 किलोमीटर) सुरंग को देश को समर्पित किया है, उसे रुड़की के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ माइनिंग एंड फ्यूल रिसर्च (सीआईएमएफआर) के वैज्ञानिकों ने डिजाइन किया है। पांच साल तक वैज्ञानिकों ने कड़ी मेहनत से इसमें आने वाली हर समस्या का तकनीकी समाधान ढूंढा और उसे अजमाया। वैज्ञानिकों के इसी हुनर के चलते आज देश को एशिया की सबसे बड़ी सुरंग बनाने का गौरव प्राप्त हुआ है।
सीबीआरआई रुड़की के कैंपस स्थित सीआईएमएफआर के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रमाधर द्विवेदी ने बताया कि टनल बनाने का काम कार्यदायी संस्था आईएल एंडएफएस ने किया है। कंपनी ने वर्ष 2012 में उन्हें यह काम सौंपा था। उनके वैज्ञानिकों ने पहले कंपनी से उपलब्ध कराए गए एक डिजाइन को जांचा, लेकिन इसमें कई खामियां थीं। इसके बाद वैज्ञानिकों ने कमियों को दूर करते हुए टनल का खुद डिजाइन तैयार किया। इसके बाद संस्थान के वैज्ञानिकों ने अपनी तकनीकी से टनल क ा निर्माण शुरू कराया और पांच साल की कड़ी मेहनत के बाद इसका निर्माण पूरा करने में सफलता हासिल की। इन पांच सालों में वैज्ञानिक लगातार जम्मू-कश्मीर के दौर पर रहे। शुरू में संस्थान को यह काम 50 लाख में दिया गया था, जो बढ़कर 75 लाख तक पहुंच गया। सुरंग बनाने में वैज्ञानिक डॉ. रमाधर द्विवेदी, डॉ. रजनीश गोयल, डॉ. जगदीश महनोत, अनिल स्वरूप और डॉ. हर्ष वर्मा ने काम किया है।
9.2 किमी. में तब्दील हो गया 41 किमी. का रास्ता
डॉ. द्विवेदी ने बताया कि सुरंग स्थायित्व से संबंधित मानकों के अनुसार यह सुरंग विश्व स्तर के सभी मानकों पर खरी उतरती है। इसमें सुरक्षा के इंतजाम अत्याधुनिक हैं। इस सुरंग के निर्माण से राजमार्ग का 41 किलोमीटर का दो घंटे का रास्ता अब 9.2 किमी. का रह गया है। इसमें अधिकतम गति सीमा 50 किमी. प्रति घंटे के हिसाब से इसे 11 मिनट में तय किया जा सकता है। इससे प्रतिदिन करीब 27 लाख का ईंधन बचेगा। साथ ही ट्रैफिक जाम से भी निजात मिलेगी।
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इस तकनीक का किया इस्तेमाल
जम्मू-कश्मीर में सुरंग के निर्माण के लिए न्यू आस्ट्रियन टनलिंग मैथड्स (एनएटीएम) विधि का इस्तेमाल किया गया है। डा. द्विवेदी ने बताया कि यह ऑस्ट्रेलिया की तकनीक है। इसके तहत प्रत्येक छोटी खुदाई के बाद टनल की मॉनीटरिंग की जाती है और सपोर्ट दी जाती है। इस तकनीकी की खासियत है कि इसमें हाथोंहाथ सभी कमियों को दूर करते हुए आगे बढ़ा जाता है। इसमें ऐसा नहीं है कि टनल बनने के बाद पता चले कि इस प्वाइंट पर प्रोजेक्ट फेल हो गया है।
क्या है सीआईएमएफआर
सीएसआईआर यानी केंद्रीय औद्योगिक अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली की देशभर में कुल 38 प्रयोगशालाएं हैं। इनमें से दो सीबीआरआई (केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान) और सीआईएमएफआर (केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान) रुड़की में स्थित है। सीएमएफआईआर केंद्र का सुरंग के लिए ही विशेष तौर पर तकनीकी शोध एवं कार्य करता है।
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सीबीआरआई रुड़की के कैंपस स्थित सीआईएमएफआर के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रमाधर द्विवेदी ने बताया कि टनल बनाने का काम कार्यदायी संस्था आईएल एंडएफएस ने किया है। कंपनी ने वर्ष 2012 में उन्हें यह काम सौंपा था। उनके वैज्ञानिकों ने पहले कंपनी से उपलब्ध कराए गए एक डिजाइन को जांचा, लेकिन इसमें कई खामियां थीं। इसके बाद वैज्ञानिकों ने कमियों को दूर करते हुए टनल का खुद डिजाइन तैयार किया। इसके बाद संस्थान के वैज्ञानिकों ने अपनी तकनीकी से टनल क ा निर्माण शुरू कराया और पांच साल की कड़ी मेहनत के बाद इसका निर्माण पूरा करने में सफलता हासिल की। इन पांच सालों में वैज्ञानिक लगातार जम्मू-कश्मीर के दौर पर रहे। शुरू में संस्थान को यह काम 50 लाख में दिया गया था, जो बढ़कर 75 लाख तक पहुंच गया। सुरंग बनाने में वैज्ञानिक डॉ. रमाधर द्विवेदी, डॉ. रजनीश गोयल, डॉ. जगदीश महनोत, अनिल स्वरूप और डॉ. हर्ष वर्मा ने काम किया है।
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9.2 किमी. में तब्दील हो गया 41 किमी. का रास्ता
डॉ. द्विवेदी ने बताया कि सुरंग स्थायित्व से संबंधित मानकों के अनुसार यह सुरंग विश्व स्तर के सभी मानकों पर खरी उतरती है। इसमें सुरक्षा के इंतजाम अत्याधुनिक हैं। इस सुरंग के निर्माण से राजमार्ग का 41 किलोमीटर का दो घंटे का रास्ता अब 9.2 किमी. का रह गया है। इसमें अधिकतम गति सीमा 50 किमी. प्रति घंटे के हिसाब से इसे 11 मिनट में तय किया जा सकता है। इससे प्रतिदिन करीब 27 लाख का ईंधन बचेगा। साथ ही ट्रैफिक जाम से भी निजात मिलेगी।
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इस तकनीक का किया इस्तेमाल
जम्मू-कश्मीर में सुरंग के निर्माण के लिए न्यू आस्ट्रियन टनलिंग मैथड्स (एनएटीएम) विधि का इस्तेमाल किया गया है। डा. द्विवेदी ने बताया कि यह ऑस्ट्रेलिया की तकनीक है। इसके तहत प्रत्येक छोटी खुदाई के बाद टनल की मॉनीटरिंग की जाती है और सपोर्ट दी जाती है। इस तकनीकी की खासियत है कि इसमें हाथोंहाथ सभी कमियों को दूर करते हुए आगे बढ़ा जाता है। इसमें ऐसा नहीं है कि टनल बनने के बाद पता चले कि इस प्वाइंट पर प्रोजेक्ट फेल हो गया है।
क्या है सीआईएमएफआर
सीएसआईआर यानी केंद्रीय औद्योगिक अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली की देशभर में कुल 38 प्रयोगशालाएं हैं। इनमें से दो सीबीआरआई (केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान) और सीआईएमएफआर (केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान) रुड़की में स्थित है। सीएमएफआईआर केंद्र का सुरंग के लिए ही विशेष तौर पर तकनीकी शोध एवं कार्य करता है।