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औद्योगिकीकरण बढ़ाने और पलयान रोकने में नाकाम डबल इंजन की सरकार
Updated Fri, 22 Dec 2017 12:14 AM IST
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रुड़की। राज्य में औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार की ओर लागू निवेश की योजना के तहत चार साल बाद भी 86 उद्योगों को सब्सिडी नहीं दी। इससे उद्यमियों में निराशा का माहौल है। राज्य स्तर पर लापरवाही का आलम यह है कि इन उद्योगों को सब्सिडी देने के लिए अधिकृत स्टेट लेवल कमेटी की पिछले चार साल में मात्र एक बैठक हो पाई है। इससे उद्यमी खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। इससे उद्यमियों की ओर से पलायन करने की भी आशंका बढ़ रही है।
केंद्र सरकार ने राज्य में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2013 में केंद्रीय पूंजी निवेश योजना लागू की थी। इसके तहत नए उद्योग स्थापित करने अथवा पुराने उद्योगों में नई मशीनरी आदि लगाने के लिए प्लांट एंड मशीनरी में किए गए निवेश पर 15 प्रतिशत सब्सिडी प्रदान की जानी थी। इस योजना का लाभ उठाने के लिए सैकड़ों उद्यमियों ने क्षेत्र में करोड़ों रुपये का निवेश तो कर दिया लेकिन, अधिकतर को सब्सिडी की फूटी कौड़ी तक नहीं दी। सब्सिडी के आवेदनों को स्टेट लेवल कमेटी स्वीकृति प्रदान करती है। एक आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्रीय पूंजी निवेश-2013 के अंतर्गत स्टेट लेवल कमेटी की बैठक अभी तक मात्र (27 सितंबर, 2016) एक हुई थी। इसमें केवल 24 उद्योगों की सब्सिडी को स्वीकृति प्रदान की है। उद्योग निदेशालय उत्तराखंड के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी केके कोटनाला की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार प्रदेश में 86 इकाइयों की सब्सिडी विचाराधीन है।
निवेश की आस में भारी ऋण के ब्याज की मार
-उद्यमियों ने केंद्र सरकार की योजना का लाभ उठाने के लिए वर्ष 2013 में निवेश की राह पकड़ी। बैंकों से किसी तरह कर्ज लेकर मशीनरी और प्लांट लगाए। उम्मीद थी कि जल्द सरकार से सब्सिडी मिलेगी तो कर्ज उतर जाएगा। रुड़की क्षेत्र में ऐसे 20 से अधिक उद्यमियों ने करोड़ों रुपये की मशीनें खरीद डाली। उत्पादन भी शुरू कर दिया लेकिन, सब्सिडी न मिलने के कारण बैंकों की देनदारी और उस पर लग रहे ब्याज उद्योगों की हालत पतली कर दी है। नाम न बताने की शर्त पर एक उद्यमी ने बताया कि क्षेत्र में दर्जनों उद्योग बंद होने की कगार पर हैं। वहीं कुछ उद्योग राज्य से पलायन करने का मन बना चुके हैं।
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कैसे साकार हो इज ऑफ डूइंग का सपना
-देश में औद्योगिकीकरण की रफ्तार को तेज करने के लिए केंद्र सरकार की इज ऑफ डूइंग और मेक इन इंडिया जैसी कवायदों को डबल इंजन की सरकार कुंद कर रही है। यह कहना है कि स्थानीय उद्यमियों का। उद्यमियों की मानें तो केंद्र और राज्य की सरकारें उद्योगों को बढ़ावा देने और व्यापार नीतियों को आसान बनाने के लिए इज ऑफ डूइंग और मेक इन इंडिया पर बातें तो बहुत कर रही है लेकिन, धरातल पर काम नहीं हो रहा है।
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केंद्र सरकार ने राज्य में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2013 में केंद्रीय पूंजी निवेश योजना लागू की थी। इसके तहत नए उद्योग स्थापित करने अथवा पुराने उद्योगों में नई मशीनरी आदि लगाने के लिए प्लांट एंड मशीनरी में किए गए निवेश पर 15 प्रतिशत सब्सिडी प्रदान की जानी थी। इस योजना का लाभ उठाने के लिए सैकड़ों उद्यमियों ने क्षेत्र में करोड़ों रुपये का निवेश तो कर दिया लेकिन, अधिकतर को सब्सिडी की फूटी कौड़ी तक नहीं दी। सब्सिडी के आवेदनों को स्टेट लेवल कमेटी स्वीकृति प्रदान करती है। एक आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्रीय पूंजी निवेश-2013 के अंतर्गत स्टेट लेवल कमेटी की बैठक अभी तक मात्र (27 सितंबर, 2016) एक हुई थी। इसमें केवल 24 उद्योगों की सब्सिडी को स्वीकृति प्रदान की है। उद्योग निदेशालय उत्तराखंड के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी केके कोटनाला की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार प्रदेश में 86 इकाइयों की सब्सिडी विचाराधीन है।
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निवेश की आस में भारी ऋण के ब्याज की मार
-उद्यमियों ने केंद्र सरकार की योजना का लाभ उठाने के लिए वर्ष 2013 में निवेश की राह पकड़ी। बैंकों से किसी तरह कर्ज लेकर मशीनरी और प्लांट लगाए। उम्मीद थी कि जल्द सरकार से सब्सिडी मिलेगी तो कर्ज उतर जाएगा। रुड़की क्षेत्र में ऐसे 20 से अधिक उद्यमियों ने करोड़ों रुपये की मशीनें खरीद डाली। उत्पादन भी शुरू कर दिया लेकिन, सब्सिडी न मिलने के कारण बैंकों की देनदारी और उस पर लग रहे ब्याज उद्योगों की हालत पतली कर दी है। नाम न बताने की शर्त पर एक उद्यमी ने बताया कि क्षेत्र में दर्जनों उद्योग बंद होने की कगार पर हैं। वहीं कुछ उद्योग राज्य से पलायन करने का मन बना चुके हैं।
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कैसे साकार हो इज ऑफ डूइंग का सपना
-देश में औद्योगिकीकरण की रफ्तार को तेज करने के लिए केंद्र सरकार की इज ऑफ डूइंग और मेक इन इंडिया जैसी कवायदों को डबल इंजन की सरकार कुंद कर रही है। यह कहना है कि स्थानीय उद्यमियों का। उद्यमियों की मानें तो केंद्र और राज्य की सरकारें उद्योगों को बढ़ावा देने और व्यापार नीतियों को आसान बनाने के लिए इज ऑफ डूइंग और मेक इन इंडिया पर बातें तो बहुत कर रही है लेकिन, धरातल पर काम नहीं हो रहा है।