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जिस पाठ्यक्रम को यूपी ने ठुकराया, उत्तराखंड उसे पढ़ा रहा...
ब्यूरो, अमर उजाला/ऋषिकेश
Updated Mon, 04 Jan 2016 01:26 AM IST
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प्रदेश के करीब 49 संस्कृत विद्यालयों के हजारों छात्र परेशान हैं। किताबें नहीं मिलने की वजह से फोटो स्टेट की प्रतियों से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यह स्थिति इसलिए बनी, क्योंकि राज्य बनने के 15 साल बाद भी प्रदेश सरकार और संस्कृत विभाग माध्यमिक स्तर प्रथमा से उत्तर मध्यमा द्वितीय वर्ष (कक्षा छह से 12) तक सिलेबस (पाठ्यक्रम) नहीं बना पाई।
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स्थिति यह है कि जिस पाठ्यक्रम को यूपी ने खत्म कर दिया है, उसे उत्तराखंड में पढ़ाया जा रहा है। इस तरह उत्तर प्रदेश की पुरानी और खारिज शिक्षा प्रणाली पर उत्तराखंड में संस्कृत की शिक्षा दी जा रही है। जबकि राज्य में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया है।
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संस्कृत के विद्वानों की भरमार वाले उत्तराखंड में सरकार और संस्कृत विभाग अपना माध्यमिक स्तर का पाठ्यक्रम आज तक नहीं तैयार कर पाया। विभाग साल 2010 में माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद के गठन के बाद से ही इस दिशा में कवायद का दावा कर रहा है, लेकिन आज तक पाठ्यक्रम तैयार नहीं हो पाया।
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ऐसी स्थिति में बच्चे अविभाजित उत्तरप्रदेश के समय से चला आ रहा पुराना पाठ्यक्रम पढ़ने को मजबूर हैं। जो पाठ्यक्रम यहां पढ़ाया जा रहा है, उसकी किताबें बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में माध्यमिक स्तर के हजारों बच्चे फोटो स्टेट की प्रतियों से पढ़ाई करने को मजबूर हैं। देववाणी संस्कृत को प्रदेश में द्वितीय राजभाषा का दर्जा तो दिया गया, लेकिन उसके बुनियादी ढांचे को विकसित करने की जहमत नहीं उठाई गई।
इन पुस्तकों का फोटोस्टेट भी नसीब नहीं
राज्य में संचालित माध्यमिक स्तर पर संस्कृत सिलेबस में कई पुस्तकें ऐसी हैं जिनकी फोटोस्टेट प्रति भी उपलब्ध नहीं है। मसलन, 18 अनिवार्य विषयों में ऋग्वेद, कृष्ण यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के साथ ही ऐच्छिक विषयों में नेपाली, गृह विज्ञान, थेरवाद, पाली आदि विषयों की छाया प्रति भी नहीं मिल पाती। ऐसे में शिक्षकों को इन विषयों को पढ़ाने में तो दिक्कत आती ही है, साथ ही बच्चों को भी यह विषय औपचारिकता बस लेने पड़ते हैं।
गुरु जी और वरिष्ठ छात्रों से मांगकर लेनी पड़ती है प्रति
जिन छाया प्रतियों से जैसे तैसे संस्कृत शिक्षा आगे बढ़ रही है उन्हें हासिल करने के लिए छात्रों को अपने वरिष्ठों और शिक्षकों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। उनके पास मौजूद फोटोस्टेट की प्रति बनाने के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं।
पाठ्यक्रम के संबंध में 19 जनवरी को निदेशक की अध्यक्षता में बैठक प्रस्तावित है। उसमें इस विषय पर चर्चा होगी। वास्तव में पाठ्यक्रम बनाने में काफी विलंब हो चुका है।-राजेंद्र कुमार बहुगुणा, उपसचिव, संस्कृत शिक्षा निदेशालय