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जीएमवीएन गेस्ट हाउस में पहाड़ी वाद्य यंत्रों का रियाज जारी

Tue, 06 Apr 2021 12:58 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Tue, 06 Apr 2021 12:58 AM IST
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The melody of the music disappearing from the mountain
ऋषिकेश। हरिद्वार-श्यामपुर बाईपास रोड स्थित जीएमवीएन भारत भूमि गेस्ट हाउस में आयोजित सात दिवसीय ‘हिमालयी निनाद’ कार्यशाला जारी है। तीसरे दिन विभिन्न जनपदों से आए कलाकारों ने अपने-अपने वाद्य यंत्रों का रियाज किया।
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सोमवार को आयोजित कार्यशाला में कालाकारों ने ढोल, दमाऊं, रणसिंघा, मसकबीन, मोछंग, हुड़का, ढौंर, थाली, नगाड़ा, बांसुरी आदि पहाड़ी वाद्य यंत्रों को बजाकर श्रोताओं की जमकर तालियां बटोरीं। कार्यक्रम संयोजक गणेश खुगशाल ने बताया कि कार्यशाला का उद्देश्य पहाड़ में अपनी पहचान खो हो रहे वाद्य यंत्रों को प्रोत्साहन देना है। युवा पीढ़ियों को इन वाद्य यंत्रों से अवगत कराना है। कार्यशाला के अंतिम दिन इन वाद्य यंत्रों की भव्यात्मक प्रस्तुति दी जाएगी। इस मौके पर रामचरण जुयाल, कैलाश ध्यानी और विनोद आदि शामिल थे।
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फोटो-
पहाड़ से गायब हो रही मसकबीन की धुन
आधुनिक कैशियो और अन्य वाद्य यंत्रों ने ले ली जगह
टिहरी के पुजारगांव निवासी विनोद साज रहे हैं मसकबीन में नई धुन
मनोज राणा
ऋषिकेश। ढोल, दमाऊं, हुड़का, रणसिंघा और मसकबीन पहाड़ी वाद्य यंत्रों के वो पुरोधा हैं, जिनकी उपस्थिति के बिना कोई भी शुभ कार्य पूरा नहीं होता। पहाड़ के शादी समारोह में इन्हीं वाद्य यंत्रों की धूम रहती है। मसकबीन की धुन के बिना तो कोई भी शादी अधूरी सी लगती है, लेकिन वर्तमान में पहाड़ों से भी मसकबीन की धुन अब गायब सी हो रही है। इस वाद्य यंत्र की जगह कैशियो और अन्य वाद्य यंत्रों ने ले ली है।
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जीएमवीएन भारत भूमि गेस्ट हाउस में आयोजित सात दिवसीय ‘हिमालयी निनाद’ कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न जनपदों के कलाकार अपने-अपने वाद्य यंत्रों की प्रस्तुतियां दे रहे हैं। इनमें से टिहरी जिले के चंद्रबदनी के पुजारगांव निवासी विनोद भी मसकबीन की धुनों में और निखार लाने के लिए प्रयासरत हैं। उनका मानना है कि मसकबीन की धुन को और पारंगत कर इसे अन्य साजों के साथ मिलाकर कुछ नया किया जा सकता है। वह इसी प्रयास के साथ कार्यशाला में शिरकत कर रहे हैं। कार्यशाला में उनकी मशकबीन की धुन सुन श्रोतागण आनंदित हो रहे हैं।

विनोद ने बताया कि वह करीब ढाई दशक से मसकबीन बजा रहे हैं। इसी से वह अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं। उन्होंने बताया कि दो दशक तक तो पहाड़ों में मसकबीन का बहुत जुनून था। शादी समारोह में बजाने के लिए एक साल पहले इसकी एडवांस बुकिंग हो जाती थी, लेकिन बीते पांच वर्षों से यह पहाड़ों में भी गायब हो रहा है। शादियों में इसकी बुकिंग अब कम हो गई है। गांव पलायन कर रहे हैं। शहरों में रहकर लोग वहीं के रीति रिवाज बैंड बाजे और कैशियो को शामिल कर रहे हैं। गांव में जो शादियों हो भी रही हैं, उसमें मसकबीन की धुन कम, कैशियों की धुन अधिक सुनाई देती है।
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