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राजनीति का हो गया व्यापारीकरण
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17 चौदहबीघा में विधानसभा चुनाव पर चर्चा करते सेवानिवृत कर्मचारी।
- फोटो : RISHIKESH
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चौदहबीघा में एक स्थान पर अपनी मित्र मंडली के साथ बैठे सेवानिवृत्त कर्मचारी विधानसभा चुनावों पर चर्चा कर रहे थे। वे आजकल दल बदलू राजनीति और चुनावों में धन बल प्रयोग पर सवाल उठा रहे थे। उनका कहना था कि अब की राजनीति जनता की सेवा करने के बजाय धन दौलत कमाने की हो रही है।
सेवानिवृत्त कर्मचारी बीरेंद्र पोखरियाल बोल रहे थे कि 70 के दशक में पार्टी के नेता लकीर के फकीर होते थे। उस दौरान चुनावों में टिकट को लेकर मारामारी नहीं होती थी। जिस भी प्रत्याशी का टिकट हाईकमान ने तय कर दिया, उसके साथ मिलकर सभी कार्यकर्ता काम करते थे। किसी नेता का टिकट कट जाता था तो वह पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र देकर चुपचाप बैठ जाता था। किसी दूसरे दल में शामिल नहीं होता था। पहले राजनीति में परिवारवाद नहीं होता था।
सेवानिवृत्त कर्मचारी जब्बर सिंह पंवार कह रहे थे कि आज की राजनीति अवसरवादी हो गई है। आज पार्टी नेता रात में किसी विपक्षी पार्टी का दामन थाम रहे हैं और सुबह उस पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं, यह चिंता का विषय है। इसके लिए चुनाव आयोग को सख्त नियम बनाने चाहिए। अब चुुनाव में नेता जनता की सेवा करने के लिए कम, अपने लिए धन दौलत कमाने के लिए ज्यादा आ रहे हैं। ऐसे नेताओं का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिए। कुर्सी मिलने पर नेताओं के वारे न्यारे हो रहे हैं। जयपाल सिंह नेगी कह रहे थे कि पहले चुनाव में धनबल और शराब का प्रचलन नहीं होता था, लेकिन अब टिकट मिलने पर जीत हासिल करने के लिए प्रत्याशी कई तरह के हथकंडे अपनाते हैं। चुनाव में शराब और धनबल का प्रयोग भी होता है। चुनाव में जीत हासिल करने के बाद कोई ठेकेदार बन जाते हैं तो कई अन्य कामों में लग जाते हैं, इसलिए पार्टी में गुटबाजी भी हो रही है। जो कि आने वाले समय के लिए ठीक नहीं है। संवाद
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सेवानिवृत्त कर्मचारी बीरेंद्र पोखरियाल बोल रहे थे कि 70 के दशक में पार्टी के नेता लकीर के फकीर होते थे। उस दौरान चुनावों में टिकट को लेकर मारामारी नहीं होती थी। जिस भी प्रत्याशी का टिकट हाईकमान ने तय कर दिया, उसके साथ मिलकर सभी कार्यकर्ता काम करते थे। किसी नेता का टिकट कट जाता था तो वह पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र देकर चुपचाप बैठ जाता था। किसी दूसरे दल में शामिल नहीं होता था। पहले राजनीति में परिवारवाद नहीं होता था।
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सेवानिवृत्त कर्मचारी जब्बर सिंह पंवार कह रहे थे कि आज की राजनीति अवसरवादी हो गई है। आज पार्टी नेता रात में किसी विपक्षी पार्टी का दामन थाम रहे हैं और सुबह उस पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं, यह चिंता का विषय है। इसके लिए चुनाव आयोग को सख्त नियम बनाने चाहिए। अब चुुनाव में नेता जनता की सेवा करने के लिए कम, अपने लिए धन दौलत कमाने के लिए ज्यादा आ रहे हैं। ऐसे नेताओं का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिए। कुर्सी मिलने पर नेताओं के वारे न्यारे हो रहे हैं। जयपाल सिंह नेगी कह रहे थे कि पहले चुनाव में धनबल और शराब का प्रचलन नहीं होता था, लेकिन अब टिकट मिलने पर जीत हासिल करने के लिए प्रत्याशी कई तरह के हथकंडे अपनाते हैं। चुनाव में शराब और धनबल का प्रयोग भी होता है। चुनाव में जीत हासिल करने के बाद कोई ठेकेदार बन जाते हैं तो कई अन्य कामों में लग जाते हैं, इसलिए पार्टी में गुटबाजी भी हो रही है। जो कि आने वाले समय के लिए ठीक नहीं है। संवाद
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