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नीलकंठ धाम में करीब 15 हजार शिवभक्तों ने किया जलाभिषेक
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09 नीलकंठ मंदिर में लगी श्रद्धालुओं की भीड़।
- फोटो : RISHIKESH
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महाशिवरत्रि पर्व को लेकर नीलकंठ मंदिर में शिवभक्तों की भीड़ उमड़ रही है। प्रात:काल से शिवालय शंख और घंटों की ध्वनि से गूंज रहे हैं। मंदिर परिसर हर हर महादेव, ऊं नम: शिवाय के मंत्रोच्चारण और जयकारों से गूंज रहा है। शिवालय में जलाभिषेक के लिए मंदिर परिसर में शिवभक्तों की लंबी लाइन लगी रही। इस दौरान सुबह से लेकर शाम तक मंदिर में करीब 15 हजार शिवभक्तों ने जलाभिषेक कर पुण्य अर्जित किया।
शनिवार को राजाजी टाइगर रिजर्व पार्क अंतर्गत नीलकंठ पैदल मार्ग और लक्ष्मणझूला-नीलकंठ मोटर मार्ग पर शिवभक्तों और कांवड़ियों की भीड़ रही। रिमझिम बारिश में भी शिवभक्त नीलकंठ धाम की ओर रवाना होते दिखे। नीलकंठ मंदिर के पुजारी शिवानंद गिरी ने बताया कि धाम में आने वाले शिवभक्तों के लिए मंदिर समिति की ओर से व्यवस्थाएं चाक चौबंद कर दी हैं। धाम में शिवभक्तों को दर्शनार्थ कोई परेशानी नहीं हो रही है।
स्कंद पुराण के केदारखंड और मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने देवताओं के आग्रह पिया था, जिसमें शिव ने अपने कंठ में समा लिया था। इसकी ऊष्णता को शांत करने के लिए भगवान शिव ने मणिकूट पर्वत की तलहटी पर वट वृक्ष के नीचे साठ हजार वर्ष तक तपस्या की थी। बाद में भगवान शिव यहां स्वयंभू लिंग के रूप में विराजमान हुए और भगवान नीलकंठ कहलाए। तब से श्रावण मास सहित शिवरात्रि में यहां जलाभिषेक का अत्यधिक महत्व माना गया है।
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शनिवार को राजाजी टाइगर रिजर्व पार्क अंतर्गत नीलकंठ पैदल मार्ग और लक्ष्मणझूला-नीलकंठ मोटर मार्ग पर शिवभक्तों और कांवड़ियों की भीड़ रही। रिमझिम बारिश में भी शिवभक्त नीलकंठ धाम की ओर रवाना होते दिखे। नीलकंठ मंदिर के पुजारी शिवानंद गिरी ने बताया कि धाम में आने वाले शिवभक्तों के लिए मंदिर समिति की ओर से व्यवस्थाएं चाक चौबंद कर दी हैं। धाम में शिवभक्तों को दर्शनार्थ कोई परेशानी नहीं हो रही है।
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स्कंद पुराण के केदारखंड और मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने देवताओं के आग्रह पिया था, जिसमें शिव ने अपने कंठ में समा लिया था। इसकी ऊष्णता को शांत करने के लिए भगवान शिव ने मणिकूट पर्वत की तलहटी पर वट वृक्ष के नीचे साठ हजार वर्ष तक तपस्या की थी। बाद में भगवान शिव यहां स्वयंभू लिंग के रूप में विराजमान हुए और भगवान नीलकंठ कहलाए। तब से श्रावण मास सहित शिवरात्रि में यहां जलाभिषेक का अत्यधिक महत्व माना गया है।
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