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सड़क न होने से खाली होने लगे दारमा के गांव
कृष्णा गर्ब्याल/अमर उजाला, धारचूला
Updated Thu, 11 Aug 2016 10:18 PM IST
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दारमा घाटी जाने के लिए पैदल सफर ही एकमात्र विकल्प
- फोटो : अमर उजाला
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सीमांत के भारत-चीन सीमा पर स्थित दारमा क्षेत्र के गांव अब भी मोटर मार्ग की बाट जोह रहे हैं। हालात यह है कि दारमा क्षेत्र से पलायन बढ़ता गया। स्थिति यह है कि सीमांत का ढाकर एवं खिमलिंग गांव तो पूरी तरह से खाली हो गया है।
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बताते हैं कि तिब्बत की ज्ञानिमा मंडी के लिए दारमा घाटी से ही लोग व्यापार के लिए जाते थे। यहां के व्यापारी राजमा, गंदरैणी, जम्बू (सेक्वा), आलू जैसी सामग्री तिब्बत ले जाते थे। सोबला में पहले मंडी थी। सोबला से ज्ञानिमा मंडी की दूरी 90 किमी है। ज्ञानिमा में भी कुछ समय बाद सरकार ने दारमा क्षेत्र की सुध ली और 2006 में मोटर मार्ग निर्माण शुरू किया। सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने 2010 के बाद सड़क निर्माण में काफी तेजी दिखाते हुए सोबला तक सड़क बना दी, लेकिन नारायणपुर, खेत नाले के पास और झिमर गांव सहित कई जगहों पर काम नहीं हुआ। सोबला से आगे काम सीपीडब्ल्यूडी को सौंपा गया।
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पहले तो सीपीडब्ल्यूडी ने दारमा क्षेत्र को जाने वाले मार्ग पर दर और बोंगलिंग के बीच स्थित दुर्गम पंगबावे की चट्टान को रिकॉर्ड समय पर काटकर आगे काम बढ़ाया, लेकिन अब भी सेला से आगे सड़क मार्ग से लोग पूरी तरह से महरूम हैं। अब भी नागलिंग नाले से नागलिंग एक किमी और नागलिंग से बालिंग 6 किमी, बालिंग से दुग्तु 7 किमी, दुग्तु से तिदांग 4 किमी सड़क बनाई जानी है।
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इस सड़क के नहीं बनने से दारमा क्षेत्र के नांगलिग, बालिंग, गो, चल, फिलम, बोन, सौन, ढाकर, दुग्तु, दांतू, तिदांग, खिमलिंग, बिदांग सीपू, मार्छा आदि जनजाति गांवों के लोग कठिन जीवन जीने को मजबूर हैं। मूलरूप से खिमलिंग और वर्तमान में धारचूला में रह रहे सामाजिक कार्यकर्ता लाल सिंह खंपा ने विगत दिनों प्रधानमंत्री से दारमा रोड के निर्माण में तेजी लाने की मांग का पत्र भेजा एवं ज्ञानिमा मंडी से पुन: व्यापार शुरू करने की मांग की, किंतु इस मामले में कोई पहल केंद्र सरकार ने नहीं की।
अभी सड़क नागलिंग नाले तक पहुंच गई है। 2017 तक इस रोड को बिदांग तक बनाया जाना है। बिदांग के बाद 7 किलोमीटर में लिमपिया धूरा आता है। इसी स्थान से पहले व्यापारी तिब्बत में प्रवेश करते थे। आईटीबीपी द्वारा भी समय-समय पर कार्य की प्रगति की देख-रेख की जाती है।-आनंद सिंह यर्सो, कमान अधिकारी, आईटीबीपी।