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जो आंगन कभी होल्यारों के लिए छोटे पड़ जाते थे वहां अब सूनापन

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Thu, 17 Mar 2022 08:45 PM IST
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The courtyards which used to be small for the Holyars are now deserted
The courtyards which used to be small for the Holyars are now deserted
पिथौरागढ़। जिस गांव में कभी खड़ी होली में होल्यारों की अधिक संख्या के कारण घरों के आंगन छोटे पड़ जाते थे पलायन से अब वह आंगन सूने पड़े हैं। ऐसा ही हाल कनालीछीना के गुड़ौली गांव का भी है, जहां पर पलायन के कारण अब होली का वह नजारा नहीं दिखाई देता है। होली पर्व में केवल गांव की गिनी चुनीं महिलाएं ही होली गायन कर परंपरा निभा रही हैं।
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कनालीछीना विकासखंड के गुड़ौली गांव में तीन दशक पूर्व तक होली का त्योहार आते ही गांव के सभी तोकों में रंगत छा जाती थी। इस गांव में रहने वाले लगभग 75 से अधिक पांडेय परिवारों के शिक्षक से लेकर सेना में तैनात जवान और अन्य नौकरी पेशा लोग होली में अवकाश लेकर घर आ जाते थे। पहले गांव में चीर बंधन भी होता था। एक बार चीर चोरी होने के बाद बिना चीर बांधे ही होली खेली जाने लगी। गांव के बुजुर्ग, युवा और बच्चे खड़ी और बैठकी होली में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे। गांव के गुड़ौली, धारगुड़ौली, अजाड़ीगांव, दंगड़ा, कुरानी, पथरानी से लेकर सिनखोली तक हर तोक में होल्यार होली गाते थे। गांव से पलायन हुआ तो शहरों में बस गए लोगों ने धीरे-धीरे होली में गांव की तरफ लौटना बंद कर दिया। अब गिने-चुने लोग ही होली पर्व पर गांव जाते हैं, लेकिन गांव में होली का रंग नहीं जम पाता है। ऐसे में होली के लिए प्रसिद्ध गांव का सूनापन बुजुर्गों को बहुत अखरता है।
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गुड़ौली गांव के 91 वर्षीय पूर्व शिक्षक एवं होली गीतों के जानकार केदार दत्त पांडेय बताते हैं कि पहले फागुन आते ही पूरा गांव होली के रंग में रंग जाता था। सभी लोग होली में जुटते थे। पूरे गांव में घर-घर होली खेली जाती थी। अब युवाओं को गांव आकर होली की इस परंपरा को आगे बढ़ाना चाहिए।
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गांव के ही 91 वर्षीय मथुरा दत्त पांडेय कहते हैं कि नौकरी होने के बावजूद होली के लिए पूरा समय निकालते थे। पिथौरागढ़ से लेकर दिल्ली में नौकरी करने वाले भी गांव आते थे। 1984 में होली के समय भारी बर्फबारी हो गई थी इसके बाद भी गांव में गजब की होली खेली गई। नई पीढ़ी को ऐसे अवसरों पर गांव में जुटना चाहिए।
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