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देश के लिए तीन युद्ध लड़ने वाले बहादुर के परिजनों को याद आई उनकी बहादुरी

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Wed, 06 Jan 2021 10:44 PM IST
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The bravery of the brave who fought three wars for the country was remembered
अस्कोट (पिथौरागढ़)। देश के लिए 1962, 1965 और 1971 की लड़ाई लड़ने वाले खोलिया निवासी एजुकेशन कोर से सेवानिवृत्त हवलदार बहादुर सिंह पाल के परिजन खुद पर गर्व महसूस कर रहे हैं। स्वर्णिम मशाल के सीमांत जिले में पहुंचने पर उन्हें बहादुर की बहादुरी याद आ गई। हालांकि, उनके परिजनों को इस बात का मलाल है कि देश के लिए तीनों लड़ाई लड़ने वाले बहादुर स्वर्णिम मशाल के दर्शन नहीं कर पाए।
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ऑनरेरी कैप्टन (सेवानिवृत्त) पदम चंद ने बताया कि बहादुर पर पूर्व सेक्टर बंाग्लादेश, ढाका में युद्ध के दौरान लड़ाई लड़ रहे सैनिकों के लिए रसद पहुंचाने का जिम्मा था। जब वह जंग जीतकर क्षेत्र में आए तो लोगों ने उन्हें फूलमालाओं से लाद दिया। दूर-दूर से लोग उनसे जंग के किस्से सुनने आते थे। हर रोज तीनों युद्ध की कहानी सुनने के लिए लोगों की भीड़ उनके घर के आगे लगी रहती थे।
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1974 में वह सेना से सेवानिवृत्त हो गए थे, लेकिन इसके बाद भी उनकी युद्ध की कहानी बच्चे-बच्चे को जुबानी याद थी। उनकी पत्नी कलावती देवी (65) बताती हैं कि जंग के किस्से सुनाते-सुनाते वह खुद को जवां महसूस करने लगते थे। देश के लिए शहीद होने वाले सैन्य अधिकारियों और सिपाहियों को याद कर खुद भी शहीद हो जाने की बात करते थे लेकिन इस बात का उन्हें हमेशा गर्व रहा कि वह देश के लिए तीन लड़ाई लड़े। उन्होंने 1962 के युद्ध में चीन तो 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में दुश्मन के छक्के छुड़ाए थे। वह फ्रेंच, रूस, जर्मन भाषा के जानकार थे।
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उन्होंने सैनिक कल्याण बोर्ड में भी अपनी सेवाएं दी। खोलिया गांव में प्रधान और सरपंच रहते हुए उन्होंने विकास कार्यों को आगे बढ़ाया। वह सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़कर भाग लेते थे। स्वर्णिम विजय मशाल के पहुंचने से सात दिन पूर्व 29 दिसंबर को उनका 90 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके पुत्र विनोद और अशोक ने कहा कि उन्हें गर्व है वह देश के लिए तीन लड़ाई लड़ने वाले पिता के अंश हैं
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