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आज भी हरे हैं जल प्रलय के जख्म
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़/धारचूला/मदकोट
Updated Fri, 17 Jun 2016 10:40 PM IST
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मदकोट में 2013 की आपदा के जख्म आज भी मौजूद
- फोटो : अमर उजाला
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16, 17 जून 2013 का वह मंजर भूलने लायक नहीं है। उसकी भयावहता की कल्पना करने मात्र से रूह कांप उठती है। वह ऐसा जलप्रलय था, जिसने हिमालयी बेल्ट में रहने वाले लोगों को गंभीर संकट में डाल दिया था। 600 से अधिक लोग उस जलप्रलय में बेघर हुए। जिले में 26 लोगों की जान 2013 के जलप्रलय में गई। सोबला, कंज्योति समेत कई गांवों का अस्तित्व मिट गया। घर, स्कूल बह गए, सोबला समेत कई बिजली परियोजना और बिजली की लाइनों को नदी का तेज बहाव लील गया। जल प्रलय के जख्म आज भी हरे हैं।
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16 जून 2013 के जलप्रलय को बृहस्पतिवार को पूरे तीन साल पूरे हो गए। उसकी विभीषिका की कल्पना कर आज भी सिहरन पैदा हो जाती है। जल प्रलय के 1095 दिन बीतने के बाद भी व्यवस्थाएं पटरी पर नहीं लौटी हैं। कई लोग आज भी पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं। धारचूला में तो तहसील भवन, विकासखंड मुख्यालय और पशुपालन विभाग का अस्पताल भूस्खलन की जद में है। नदियों के तेज प्रवाह को रोकने के लिए तटबंध बने हैं, लेकिन नदी तट से काफी दूरी पर खतरे में आई बस्तियों, सरकारी कार्यालयों को बचाने के लिए कोई उपाय इन तीन सालों में नहीं हो पाए। सोबला की बिजली परियोजना को पुन: स्थापित करने का काम नहीं हुआ।
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2013 के जलप्रलय में मुनस्यारी तहसील के मदकोट में 13 मकान ध्वस्त हो गए थे। एक बड़े शापिंग कांपलेक्स के साथ ही दर्जनों मकानों तक भूमि का कटाव होने से ये भवन रहने लायक नहीं रह गए। मदकोट में ग्राम पंचायत भवन और पटवारी चौकी टूट गई थी। दोनों का फिर से निर्माण नहीं हुआ। जीआईसी के स्टाफ क्वार्टर में पटवारी चौकी का संचालन होता है। ग्राम पंचायत की बैठक भी जीआईसी के हाल में होती है।
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धारचूला हो या मदकोट अथवा नाचनी या अन्य कोई क्षेत्र नदी के वेग को रोकने के लिए नदियों में तटबंध बने हैं, लेकिन खतरे की जद में आए भवनों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हुए हैं। नदी तट से करीब 50 से 60 मीटर की ऊंचाई पर भवन गिरने की कगार में खड़े हैं।
उसी हाल में है कंज्योति, सोबला सड़क
धारचूला से कंज्योति सोबला को जोड़ने वाली सड़क उसी हाल में है। सड़क पर कई स्थानों में नए पुल बनने थे, सड़क पर डामरीकरण होना था। ऐसा हो नहीं पाया है। कंज्योति, सोबला फिर से बस भी नहीं सका है।
रहने लायक नहीं रह गए मकान
नियमों के अनुसार खतरे की जद में आए मकान और गिरने के कगार पर पहुंचे मकानों का मुआवजा नहीं मिलता है, सो इन लोगों को भी नहीं मिला। जलप्रलय में रहने लायक न रह गए मकानों का मुआवजा न मिलने से लोग हर समय खतरे की जद में आए मकानों में रहने पर मजबूर हैं। मदकोट के देब सिंह पंवार के मकान तक की जमीन बह गई थी। वह बताते हैं कि उनको सरकार से कुछ नहीं मिला। आज भी वह खतरे की जद में आए मकान में जान जोखिम में डालकर रहने को मजबूर हैं। मदकोट के आपदा प्रभावित दुकानदार ईश्वर सिंह फर्स्वाण, उत्तम लाल वर्मा, कैलाश धामी, शीला भंडारी, नारायण सिंह मर्तोलिया खतरे की जद में आए भवनों में दुकान चला रहे हैं। इनमें से कुछ ही व्यापारियों को 25000-25000 रुपये की मदद मिली।
प्रस्ताव को मिलनी चाहिए मंजूरी
मदकोट के ग्राम प्रधान हरीश उप्रेती कहते हैं कि पंचायत भवन और पटवारी चौकी के पुनर्निर्माण का प्रस्ताव भेजा गया है, इसको मंजूरी मिलनी चाहिए। कहते हैं राज्य वित्त में से खतरे की जद में आए मकानों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा दीवार लगाई जाएगी।
सरकार को मदद करनी चाहिए
मदकोट में खतरे की जद में आए शापिंग कांपलेक्स में किराए में दुकान चलाने वाले व्यापारी ईश्वर सिंह फर्स्वाण बताते हैं कि उन्हें सरकार की ओर से मात्र 25000 रुपये की मदद मिली। डेंजर जोन में दुकान चला रहे हैं। सरकार को उन जैसे लोगों की मदद करनी चाहिए।