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तमाम सरकारें बदली लेकिन वनराजियों की किस्मत का आज तक नहीं हुआ फैसला

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Fri, 07 Jan 2022 12:09 AM IST
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No Politics in Raji ST Of Pithauragarh
पिथौरागढ़ जिले के मदनपुरी गांव के वनराजि परिवार। संवाद न्यूज एजेंसी - फोटो : PITHORAGARH
भक्त दर्शन पांडेय
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पिथौरागढ़। एक बार फिर फिजा में चुनावी शोर गूंजने लगा है। राजनीतिक दलों के नेता तमाम मुद्दों को लेकर वादों और दावों के साथ जनता के बीच पहुंचने लगे हैं लेकिन हर बार की तरह इस बार के चुनावी शोर में भी वनराजि ऐसे मतदाता होंगे जो न किसी राजनीतक दलों के लिए चुनावी मुद्दा बनेंगे और न ही नई सरकार बनने पर इनकी किस्मत का फैसला होगा।
पिथौरागढ़ जिले में निवास करने वाले वनराजि (वन रावत) उत्तराखंड की अकेली आदम जनजाति है। डीडीहाट, धारचूला और कनालीछीना विकासखंड के नौ गांवों में वनराजि जनजाति के 202 परिवार रहते हैं। इनकी आबादी करीब 702 है। डीडीहाट तहसील के वनराजि गांव मदनपुरी व कूटा चौरानी में कुल 54 परिवार, धारचूला तहसील के किमखोला, भक्तरवा, चिफलतरा व गणां गांव में कुल 96 परिवार, कनालीछीना विकासखंड के कंतोली, औलतड़ी और कुलेख तोक में 51 वनराजि परिवार निवास करते हैं। इनमें मतदाताओं की संख्या लगभग 550 है। कभी कंदराओं में रहने वाली यह आदम जनजाति पिछले पांच दशकों में तमाम झंझावातों के बीच कच्चे-पक्के मकानों तक तो पहुंच गए लेकिन आज भी मुख्य धारा में शामिल नहीं हो सके हैं।
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सीमित जनसंख्या और मतदाताओं के कारण यह आदम जनजाति यूपी के दौर में कभी राजनीतिक दलों के एजेंडे में शामिल नहीं हो सकी। राज्य गठन के बाद भी यह उपेक्षित ही रहे। हालांकि राज्य के गठन के बाद इस जनजाति के गगन सिंह रजवार को धारचूला विधान सभा की जनता ने दो बार विधान सभा भेजा। इसके बावजूद इस जनजाति की न सत्ता के गलियारों में आवाज बुलंद हो सकी और न ही इनका उत्थान हो सका। हालात यह हैं कि एक हजार का आंकड़ा तक नहीं छू सकी इस जनजाति के लोग शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार के लिए आज भी तरसते रहते हैं।
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वनराजियों के जीवन में परेशानियों का अंबार
पहले लकड़ी के बर्तन और कृषि यंत्र बनाकर आजीविका चलाते थे। पहाड़ में अधिकांश परिवारों के कृषि को तिलांजलि देने से इस आदम जनजाति के बनाए सामान की बिक्री भी बंद हो गई। अब महिलाएं मवेशी पालन करती हैं तो पुरुष मजदूरी की तलाश में भटकते रहते हैं। इस जनजाति के बच्चों के लिए खोला गया एक स्कूल भी फंडिंग नहीं मिलने से बंद हो गया। गरीबी के कारण वनराजि जनजाति परिवारों के अधिकतर बच्चे पांचवीं कक्षा के बाद नहीं पढ़ पाते हैं। सात सौ की आबादी में एक ही छात्रा ने इंटर पास करने के बाद महाविद्यालय देखा। इस वर्ग की महिलाओं के लिए स्वास्थ्य की कोई सुविधा नहीं है। 55 से अधिक उम्र की अधिकतर महिलाएं मोतियाबिंद की समस्या से जूझ रही हैं। बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य का दावा करने वाली सरकारें और तमाम एनजीओ इन वनराजि महिलाओं के आंखों के आपरेशन के लिए एक शिविर तक नहीं लगा सके हैं।

चंपावत जिले में के खिरद्वारी गांव में भी रहते हैं वनरावत
पिथौरागढ़। उत्तराखंड की एकमात्र जनजाति वनराजि के कुुछ परिवार चंपावत जिले में भी निवास करते हैं। चंपावत जिले में पोथ ग्राम पंचायत के खिरद्वारी तोक में लगभग 120 लोग रहते हैं। इस गांव तक पहुंचने के लिए 12 किमी पैदल चलना पड़ता है। यहां रहने वाले परिवारों के हालात भी पिथौरागढ़ जिले के वनराजियों सरीखे ही हैं।
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