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नौ साल बाद भी नहीं भरे ला और झेकला के जख्म
कालिका रावल/जीवन दानू/अमर उजाला, पिथौरागढ़/नाचनी
Updated Tue, 07 Aug 2018 10:39 PM IST
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ला झेकला में घर की देहरी से देखता वृद्ध
- फोटो : अमर उजाला
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आठ अगस्त 2009 को ला और झेकला में आई आपदा के जख्म अभी तक नहीं भरे हैं। इस आपदा में दो गांव पिथौरागढ़ के नक्शे से ही मिट गए थे और 43 लोगों ने जान गंवाई थी। 300 नाली कृषि योग्य भूमि तबाह हो गई और पांच दर्जन पशु जिंदा दफन हो गए थे।
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2009 में सात अगस्त की रात करीब ढाई बजे बादल फटने से दाफा ग्राम पंचायत की बांजानी पहाड़ी दरक गई। मलबे ने नींद में सोए ला, झेकला के 38 और बेड़ूमहर गांव के पांच लोग मलबे में दफन हो गए। आठ अगस्त सुबह तबाही का मंजर दिखा था। ला, झेकला में आबादी थी। वहां लोग खेती और पशुपालन करते थे। आज वहां डेढ़ किलोमीटर के दायरे में मलबे के ऊपर हरी घास उग आई है।
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यहां कहर में जीवित बचे लोगों के जख्म आज भी हरे हैं। सरकार ने मृतकों के परिजनों को एक-एक लाख के हिसाब से 43 लाख रुपये बांटे और खतरे से घिरे परिवारों को दूसरी जगह बसाने की भी बात की थी। ला के 12 परिवार झेकला में रहते हैं। चार परिवार तराई में बस गए। झेकला के 15 परिवार चचना में रहते हैं। यह लोग अब भी मानसूनी बारिश में दहशत के बीच अपनी जिंदगी बिता रहे हैं। दाफा के प्रधान धन सिंह राणा के मुताबिक बांजानी पहाड़ी जर्जर हो चुकी है। विस्थापन के अलावा कोई उपाय नहीं है।
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बुजुर्ग ने खो दिया पूरा कुनबा
झेकला के बुजुर्ग बहादुर सिंह (93) ने आपदा में अपने पुत्रों, बहुओं, पोते, पोतियों को खोया। आपदा से पहले झेकला निवासी बहादुर सिंह का 11 सदस्यों परिवार था। हादसे में बहादुर सिंह के दो लड़के, दो बहूएं, दो पोतियां, तीन पोते सहित कुल नौ लोग मारे गए। बहादुर सिंह और उनकी पत्नी मोतिमा देवी की जान उस रात झेकला स्थित दूसरे मकान में रहने की वजह से बची। हादसे से मोतिमा देवी को भारी सदमा लगा और सात माह बाद उनकी मृत्यु हो गई। बुजुर्ग बहादुर सिंह के लड़के बलवंत सिंह की बेटी चंपा (30) क्वीटी और गंगा (32) होकरा में ब्याही हैं।
फोटो 07 पीटीएच 03 पी
पिथौरागढ़ जिले की आपदा की घटनाओं पर एक नजर
वर्ष स्थान मौतें
1977 तवाघाट 44
1983 धामीगांव 10
1996 रैतोली 18
1998 मालपा 260
2000 हुड़की 19
2002 खेत 9
2007 बरम 15
2009 ला, झेकला 43
2013 धारचूला/मुनस्यारी 27
2017 बस्तड़ी, कुमालगौनी 28
2018 अब तक 8