इनरलाइन के मुद्दे पर होगा बड़ा आंदोलन
इनरलाइन (प्रतिबंधित क्षेत्र) की सीमा छियालेख से हटाकर एक बार फिर से जौलजीबी में लाने की मांग को लेकर यहां बड़े आंदोलन की तैयारी होने लगी है। यहां के युवाओं ने संघर्ष समिति का गठन कर इस मुद्दे पर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने का फैसला लिया है। 1960 में भारत और चीन के बीच संबंध खराब होने के कारण केंद्रीय गृहमंत्रालय ने तिब्बत की सीमा से लगे धारचूला क्षेत्र को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया था। प्रतिबंधित क्षेत्र की सीमा जौलजीबी बनाई गई। जौलजीबी से आगे धारचूला नगर या उससे आगे के इलाके में जाने वालों को एसडीएम के माध्यम से परमिट बनाना पड़ता था। 1998 में सरकार ने इनरलाइन को पर्यटन विकास के लिए रोड़ा मानते हुए जौलजीबी से हटाकर धारचूला से 60 किलोमीटर दूर छियालेख में कर दिया।
युवा समाजसेवी महेंद्र बुदियाल और ओमप्रकाश कापड़ी का कहना है कि इनरलाइन की सीमा हटने के बाद से धारचूला में अराजक और अपराधी किस्म के लोगों की गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। अब लोग बेरोकटोक धारचूला पहुंच जाते हैं। यहां पर वह आपराधिक घटनाएं कर यहां से निकल लेते हैं। लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध हटने का फायदा अपराधी उठा रहे हैं।
क्या है इनरलाइन का महत्व
किसी भी क्षेत्र में सुरक्षा को देखते हुए केंद्र सरकार प्रतिबंधित क्षेत्र के नियम लागू करता है। जब तक जौलजीबी में इनरलाइन थी तब तक कोई भी बाहरी व्यक्ति तीन दिन से अधिक धारचूला में नहीं रह सकता था। इस समय छियालेख से आगे जाने के लिए भी यही नियम लागू तो होते हैं, लेकिन इतनी दूर आम आदमी नहीं जाता।
यह केंद्र सरकार का मामला है
एसडीएम पारितोष वर्मा का कहना है कि इनरलाइन को शिफ्ट करना केंद्र सरकार के अधीन होता है। केंद्र सरकार चाहे तो इनरलाइन की सीमा को कहीं भी शिफ्ट कर सकती है। इसके लिए सुरक्षा मापदंडों का पूरी तरह विश्लेषण किया जाता है। जनता की ओर से उठाई जा रही आवाज की जानकारी केंद्र सरकार को दी जाएगी।