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इस उम्र में भी नशा काफूर करने का दम
ब्यूरो/अमर उजाला /पिथौरागढ़
Updated Tue, 03 Feb 2015 10:34 PM IST
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शराब विरोधी आंदोलन में कभी सक्रिय रहने वाली सावित्री खड़ायत का जोश 70 साल की उम्र में भी ठंडा नहीं पड़ा है। इस उम्र में भी उनमें शराब को जड़ से उखाड़ने का ‘नशा’ है। उनका मानना है कि महिलाएं ही गांवों से शराब को दूर सकती हैं। यदि महिलाओं की सक्रियता कम हुई तो शराब के धंधे से जुड़े लोग सक्रिय होने लगेंगे। वर्ष 2004 में चलाए गए उनके आंदोलन का असर अब भी भुरमुनी गांव में दिख रहा है। वहां न तो शराब की कोई भट्ठी चलती है और न ही कोई शराब पीकर उत्पात मचाता है।
22 फरवरी 2004 को अमर उजाला ने प्रथम पृष्ठ पर ‘बस एक सीटी बजी और सारा नशा काफूर’ शीर्षक से खबर छापी थी। इस अद्भुत अभियान का संचालन पिथौरागढ़ तहसील के भुरमुनी गांव की सावित्री खड़ायत ने किया था। तब वह महिला मंगल दल की अध्यक्ष थीं। सावित्री के पास अब महिला मंगल के अध्यक्ष का पद तो नहीं है, लेकिन वह गांव में सुधार की मुहिम को लगातार आगे बढ़ा रही हैं। उनका कहना है कि नई पीढ़ी को इस बात से सावधान करना होगा कि गांव में शराब जैसी बुराई फिर से सिर न उठाए।
सावित्री ने 2004 में जब शराब के खिलाफ अभियान शुरू किया था तो उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लोगों को शराब की लत से बाहर निकालने के लिए उन्होंने महिलाओं को ही संगठित करने की ठानी। सावित्री ने तय किया कि जो भी गांव में शराब पीकर आएगा उसे बिच्छू घास लगाया जाए। जो शराब की भट्टी चलाएगा उससे 200 रुपए जुर्माना वसूला जाएगा। गांव की लगभग सभी महिलाओं को उन्होंने अपने संगठन का हिस्सा बनाया। गांव से शराब दूर हो गई। सावित्री कहती हैं कि यदि अच्छाई के बीज बो दिए जाएं तो एक बार वह जरूर फलित होते हैं। पिछली पीढ़ी ने चाहे जो भी गलतियां कीं लेकिन नई पीढ़ी की समझ काफी बढ़ गई हैं। वे रचनात्मक कामों में ध्यान देते हैं। गांव में खेल के आयोजन होने लगे हैं। सफाई और शिक्षा के प्रति चेतना का विकास हुआ है। वह कहती हैं कि शराब पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए। पहाड़ के लोगों के बर्बाद होने के पीछे मुख्य कारण शराब ही है।
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घर में कलह के कारण संभाली थी कमान
सावित्री खड़ायत बताती हैं कि 11 साल पहले शराबियों का गांव में रोज हंगामा होने लगा था। हर परिवार में कलह होने लगी थी। तब उनको लगा कि शराब विरोधी आंदोलन की कमान खुद संभालनी चाहिए। उन्होंने सुधार का जो बीड़ा उठाया उसके अच्छे परिणाम भी सामने आए। सावित्री गांव में शराब के कारण गांव में होने वाली अशांति से दुखी थी।
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22 फरवरी 2004 को अमर उजाला ने प्रथम पृष्ठ पर ‘बस एक सीटी बजी और सारा नशा काफूर’ शीर्षक से खबर छापी थी। इस अद्भुत अभियान का संचालन पिथौरागढ़ तहसील के भुरमुनी गांव की सावित्री खड़ायत ने किया था। तब वह महिला मंगल दल की अध्यक्ष थीं। सावित्री के पास अब महिला मंगल के अध्यक्ष का पद तो नहीं है, लेकिन वह गांव में सुधार की मुहिम को लगातार आगे बढ़ा रही हैं। उनका कहना है कि नई पीढ़ी को इस बात से सावधान करना होगा कि गांव में शराब जैसी बुराई फिर से सिर न उठाए।
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सावित्री ने 2004 में जब शराब के खिलाफ अभियान शुरू किया था तो उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लोगों को शराब की लत से बाहर निकालने के लिए उन्होंने महिलाओं को ही संगठित करने की ठानी। सावित्री ने तय किया कि जो भी गांव में शराब पीकर आएगा उसे बिच्छू घास लगाया जाए। जो शराब की भट्टी चलाएगा उससे 200 रुपए जुर्माना वसूला जाएगा। गांव की लगभग सभी महिलाओं को उन्होंने अपने संगठन का हिस्सा बनाया। गांव से शराब दूर हो गई। सावित्री कहती हैं कि यदि अच्छाई के बीज बो दिए जाएं तो एक बार वह जरूर फलित होते हैं। पिछली पीढ़ी ने चाहे जो भी गलतियां कीं लेकिन नई पीढ़ी की समझ काफी बढ़ गई हैं। वे रचनात्मक कामों में ध्यान देते हैं। गांव में खेल के आयोजन होने लगे हैं। सफाई और शिक्षा के प्रति चेतना का विकास हुआ है। वह कहती हैं कि शराब पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए। पहाड़ के लोगों के बर्बाद होने के पीछे मुख्य कारण शराब ही है।
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घर में कलह के कारण संभाली थी कमान
सावित्री खड़ायत बताती हैं कि 11 साल पहले शराबियों का गांव में रोज हंगामा होने लगा था। हर परिवार में कलह होने लगी थी। तब उनको लगा कि शराब विरोधी आंदोलन की कमान खुद संभालनी चाहिए। उन्होंने सुधार का जो बीड़ा उठाया उसके अच्छे परिणाम भी सामने आए। सावित्री गांव में शराब के कारण गांव में होने वाली अशांति से दुखी थी।