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हिलजात्रा उत्सव में आस्था और रोमांच का संगम
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़
Updated Fri, 02 Sep 2016 10:42 PM IST
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कुमौड़ के हिलजात्रा में उछलकर लोगों को आशीर्वाद देता लखियाभूत
- फोटो : विपिन गुप्ता
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कुमौड़ के ऐतिहासिक मैदान में शुक्रवार को आस्था और रोमांच के बीच हिलजात्रा महोत्सव की धूम रही। हजारों लोगों ने लखियाभूत के दर्शन किए। उसका आशीर्वाद लिया। हिलजात्रा के दौरान पर्वतीय कृषि की जटिलताओं को सामने लाने का प्रयास किया जाता है। लोगों का विश्वास है कि लखियाभूत की उपासना से किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आती। यह उत्सव लखियाभूत को मनाने के लिए ही आयोजित होता है। हर साल आठूं पर्व संपन्न होने के बाद हिलजात्रा के आयोजन की तिथि गांव के लोग तय करते हैं। इसकी एक सप्ताह से तैयारी हो जाती है।
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शुक्रवार दोपहर बाद नगर एवं आसपास के लोगों का रुख कुमौड़ की तरफ था। मौसम साफ होने से लोगों की भीड़ ज्यादा बढ़ गई। अपरान्ह करीब छह बजे लखियाभूत ने मैदान में प्रवेश किया। उससे पहले गल्या बल्द, रोपाई लगाने वाली पुतारियों ने कई कार्यक्रम दिखाए। लोकगीत और लोकनृत्य की धुन पर पूरा माहौल गूंज रहा था। इस बार लखियाभूत नीरज महर बने थे, जबकि गांव के अन्य युवकों को गल्या बल्द बनाया गया था। हिलजात्रा में मुखौटा पहनकर ही सारे कार्यक्रम होते हैं।
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हिलजात्रा महोत्सव समिति के अध्यक्ष गोपू महर ने सभी का स्वागत किया। पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने कहा कि हिलजात्रा ने इस गांव को पहचान दी है। इसे बचाए रखने के लिए लोग सजग रहें। विधायक मयूख महर ने कहा कि युवा पीढ़ी ने जिस तरह इस परंपरा को जीवंत रखा है वह तारीफ के योग्य है। इस मौके पर पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत, वन विकास निगम के अध्यक्ष हरीश धामी, पालिकाध्यक्ष जगत सिंह खाती, भाजपा नेता सुरेश जोशी, भाजपा जिलाध्यक्ष वीरेंद्र वल्दिया, इंदर लुंठी, एसपी रोशन लाल शर्मा, व्यापार संघ अध्यक्ष शमशेर महर, कै. दीवान सिंह वल्दिया, जनार्दन उप्रेती, चंद्रशेखर महर आदि थे।
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मुखौटा और जात्रा का मिलन उत्सव
हिलजात्रा में एक ओर महाहिमालयी क्षेत्र के मुखौटा नृत्य का प्रदर्शन होता है तो दूसरी ओर इसमें देश के अन्य हिस्सों में प्रचलित जात्रा परंपरा का भी समावेश है। यह कृषि से जुड़ा उत्सव है। पहले जब लोगों के पास मनोरंजन के अन्य साधन नहीं थे, तब ऐसे लोकोत्सवों में जन भागीदारी बहुत ज्यादा होती थी। इतिहासकार बताते हैं कि कुमौड़ एवं पिथौरागढ़ जिले के अन्य गांवों में यह परंपरा दो सौ साल से ज्यादा समय से चली आ रही है। लोग सुख और समृद्धि की कामना के साथ ही कृषि से जुड़ी सारी गतिविधियों से अभिनय के माध्यम से लोगों को परिचित कराने का प्रयास करते हैं। बारिश के मौसम में पहाड़ पर चारों ओर हरियाली छा जाती है। फसलें लहलहाने लगती हैं। ऐसे में उत्सव मनाकर लोग स्वस्थ मनोरंजन करते हैं। इतिहासकार डा. राम सिंह का कहना है कि महाहिमालय के मणिपुर, अरुणांचल प्रदेश, सिक्किम आदि प्रांतों में भी मुखौटा नृत्य की परंपरा है। लोग ऐतिहासिक पात्रों की नकल करते हैं। ठीक इसी तरह बंगाल में जात्रा की परंपरा है।
रंगमंच में मिलता रहा है स्थान
आज भी यदि कहीं पर लोकनाट्य पर आधारित किसी प्राचीन विषय को दर्शाने की कोशिश हो तो सबसे पहले हिलजात्रा को ही मंचित किया जाता है। हिलजात्रा का सबसे पहले 1983 में दिल्ली दूरदर्शन से प्रसारण हुआ। पिथौरागढ़ की सांस्कृतिक संस्था नवोदय पर्वतीय कला केंद्र ने हिलजात्रा को अपने कार्यक्रमों का मुख्य हिस्सा बना लिया। नवोदय की ओर से अब तक देश के विभिन्न शहरों में 17 बार हिलजात्रा का मंचन किया जा चुका है। 1996 में रामनगर में हुए पर्वतीय सांस्कृतिक महोत्सव में इस प्रस्तुति को पहला स्थान मिल गया। उसके बाद जमशेदपुर, सूरजकुंड, टिहरी और दिल्ली में भी हिलजात्रा के मंचीय कार्यक्रम हुए और हर बार यह आयोजन पहला स्थान प्राप्त करता रहा। नवोदय पर्वतीय कला केंद्र के निदेशक हेमराज बिष्ट बताते हैं कि उन्होंने इस लोक परंपरा के नाट्य रूपांतर के समय मूल विषय की गरिमा को बनाए रखा है।