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विकास हुआ तो प्रदेश के 1668 गांव क्यों हुए जन शून्य
Thu, 14 Mar 2019 10:45 PM IST
kamlesh kamlesh
ब्यूरो/ अमर उजाला , पिथौरागढ़।
ब्यूरो/ अमर उजाला , पिथौरागढ़।
Published by: kamlesh kamlesh
Updated Thu, 14 Mar 2019 10:45 PM IST
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- फोटो : पिथौरागढ़
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जिस पर्वतीय क्षेत्र के विकास के लिए अलग उत्तराखंड राज्य बना, वहां की जनता 18 साल बाद भी विकास के लिए तरस रही है। सुविधाओं के अभाव में लोग तेजी से गांव छोड़ रहे हैं। इसी का नतीजा है कि आज प्रदेश के 1668 गांव जन शून्य हो गए हैं। अपनी उपलब्धियों को लेकर वोट के लिए गांव जाने वाले नेताओं को लोक सभा चुनावों में पलायन के कारणों का जवाब भी जनता को देना पड़ सकता है।
प्रदेश में 7950 ग्राम पंचायतें हैं। इनमें से अधिकांश गांवों में आज भी सड़क की सुविधा नहीं है। विद्यालय शिक्षक विहीन तो अस्पताल चिकित्सक विहीन हैं। मामूली उपचार के लिए भी पांच से 50 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। डोली में दम तोड़ना मरीजों की नियति बन गई है। खेती पर कभी मौसम तो कभी जंगली जानवरों की मार पड़ रही है। रोजगार की कोई सुविधा नहीं है। इन तमाम असुविधाओं के कारण ग्रामीण तेजी से पलायन कर रहे हैं। पलायन से चिंतित मौजूदा सरकार ने दो वर्ष पहले 2017 में पलायन आयोग गठित किया था। पलायन आयोग ने सभी गांवों में पलायन पर सर्वे की थी। इसमें प्रदेश के 1668 गांव जन शून्य मिले।
पौड़ी, अल्मोड़ा, रुद्रप्रयाग, टिहरी और पिथौरागढ़ जिलों में पलायन की स्थिति भयावह पाई गई। पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में 6,338 ग्राम पंचायतों से पलायन हुआ है। इन ग्राम पंचायतों से तीन लाख 83 हजार 726 लोग नगरीय क्षेत्रों की ओर पलायन कर चुके हैं। 50 प्रतिशत पलायन केवल रोजगार के लिए हुआ, जबकि शेष पलायन सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी सुविधाओं के अभाव में हुआ। दो-दो अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर बसे पिथौरागढ़ जिले में पलायन की स्थिति चिंतनीय है।
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यहां पर चीन सीमा से लगे धारचूला, मुनस्यारी के दो दर्जन से अधिक गांव पूरी तरह से खाली हो गए हैं। यही स्थिति नेपाल सीमा से लगे गांवों की भी है। पलायन से खाली हुए मकानों में नेपाली मजदूर रह रहे हैं। अब भी पलायन लगातार जारी है। इन हालातों में वोट मांगने के लिए घर-घर जाने वाले नेताओं को पलायन पर भी जवाब देना होगा।
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प्रदेश में 7950 ग्राम पंचायतें हैं। इनमें से अधिकांश गांवों में आज भी सड़क की सुविधा नहीं है। विद्यालय शिक्षक विहीन तो अस्पताल चिकित्सक विहीन हैं। मामूली उपचार के लिए भी पांच से 50 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। डोली में दम तोड़ना मरीजों की नियति बन गई है। खेती पर कभी मौसम तो कभी जंगली जानवरों की मार पड़ रही है। रोजगार की कोई सुविधा नहीं है। इन तमाम असुविधाओं के कारण ग्रामीण तेजी से पलायन कर रहे हैं। पलायन से चिंतित मौजूदा सरकार ने दो वर्ष पहले 2017 में पलायन आयोग गठित किया था। पलायन आयोग ने सभी गांवों में पलायन पर सर्वे की थी। इसमें प्रदेश के 1668 गांव जन शून्य मिले।
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पौड़ी, अल्मोड़ा, रुद्रप्रयाग, टिहरी और पिथौरागढ़ जिलों में पलायन की स्थिति भयावह पाई गई। पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में 6,338 ग्राम पंचायतों से पलायन हुआ है। इन ग्राम पंचायतों से तीन लाख 83 हजार 726 लोग नगरीय क्षेत्रों की ओर पलायन कर चुके हैं। 50 प्रतिशत पलायन केवल रोजगार के लिए हुआ, जबकि शेष पलायन सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी सुविधाओं के अभाव में हुआ। दो-दो अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर बसे पिथौरागढ़ जिले में पलायन की स्थिति चिंतनीय है।
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यहां पर चीन सीमा से लगे धारचूला, मुनस्यारी के दो दर्जन से अधिक गांव पूरी तरह से खाली हो गए हैं। यही स्थिति नेपाल सीमा से लगे गांवों की भी है। पलायन से खाली हुए मकानों में नेपाली मजदूर रह रहे हैं। अब भी पलायन लगातार जारी है। इन हालातों में वोट मांगने के लिए घर-घर जाने वाले नेताओं को पलायन पर भी जवाब देना होगा।