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Pithoragarh News: सीमांत जिले में होगी उच्च गुणवत्ता के तिमूर की पैदावार
Tue, 06 Aug 2024 11:36 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Tue, 06 Aug 2024 11:36 PM IST
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पिथौरागढ़ स्थित सगंध पौध केंद्र की बिषाड़ नर्सरी। संवाद
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पिथौरागढ़। सगंध पौध केंद्र (कैप) सेलाकुंई, देहरादून की ओर से यहां स्थित बिषाड़ फार्म को तिमूर की हाईटेक नर्सरी के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां से ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को तिमूर के पौधे उपलब्ध किए जा रहे हैं। कैप की मेहनत रंग लाई तो आने वाले समय में सीमांत जिले में उच्च गुणवत्ता के तिमूर की पैदावार होगी।
कैप के जिला प्रभारी सुनील सिंह बर्थवाल ने बताया कि सेटेलाइट सेंटर में तिमूर की नर्सरी तैयार की गई है। यहां अभी तीन हजार पौधे तिमूर के हैं। बताया कि नर्सरी में बीज तैयार कर सेलाकुंई में पौध तैयार की जाती है। फार्म में कैप के वैज्ञानिक तिमूर की नई प्रजाति को विकसित करने में लगे हैं। मुनस्यारी क्षेत्र में तिमूर की पांच हजार पौध लगाई गई है। इससे आने वाले समय में किसानों को आर्थिकी में इजाफा होगा। किसानों को तिमूर की खेती के लिए प्रोत्साहित करने को सेटेलाइट सेंटर में प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
बर्थवाल ने बताया कि बरसात सीजन में गणकोट, पसमा, आगांव और मुनस्यारी क्षेत्र में 2000 से अधिक पौधों का रोपण किया गया है। पसमा स्थित हिमग्रेस फार्म में तिमूर के साथ ही अन्य सगंध पौधे भी लगाए जा रहे हैं। सेटेलाइट सेंटर में वर्तमान में लेमनग्रास, लेमन बाम, वन तुलसी, डेमस्क गुलाब, तिमूर, तेजपत्ता, सिट्रोनेला, गनियाग्रास, पिपरमेंट का प्रदर्शन क्षेत्र भी बनाया गया है। बताया कि किसान और स्कूली बच्चे सेंटर का भ्रमण कर सकते हैं।
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इतनी खूबियों से भरपूर होता है तिमूर:
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में पाया जाने वाला तिमूर औषधीय गुणों से भरपूर होता है। इस पौधे का वैज्ञानिक नाम जेनथोजायलम अर्मेटम है। इस पेड़ की पत्तियां, टहनी, बीज और फल सभी फायदेमंद होते हैं। तिमूर के बीजों में पोटेशियम की मात्रा भरपूर होती है। इसके सेवन से बीपी नियंत्रित रहता है। इसके बीजों का प्रयोग मसालों के रूप में किया जाता है। पहाड़ के लोग खाना बनाने के लिए तिमूर के बीजों का इस्तेमाल मसाले के रूप में करते हैं। जाड़ों में इसका सूप पिया जाता है। इसकी चटनी भी बनाई जाती है जो खाने में बेहद स्वादिष्ट होती है। दांत दर्द में भी इसका उपयोग किया जाता है। तिमूर की लकड़ी का आध्यात्मिक महत्त्व भी है। इसकी लकड़ी को शुभ माना जाता है। तिमूर की लकड़ी को मंदिरों और धामों में प्रसाद के रूप में भी चढ़ाया जाता है। साधु सन्यासी इसके तने को लाठी के रूप में उपयोग में लाते हैं।
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कैप के जिला प्रभारी सुनील सिंह बर्थवाल ने बताया कि सेटेलाइट सेंटर में तिमूर की नर्सरी तैयार की गई है। यहां अभी तीन हजार पौधे तिमूर के हैं। बताया कि नर्सरी में बीज तैयार कर सेलाकुंई में पौध तैयार की जाती है। फार्म में कैप के वैज्ञानिक तिमूर की नई प्रजाति को विकसित करने में लगे हैं। मुनस्यारी क्षेत्र में तिमूर की पांच हजार पौध लगाई गई है। इससे आने वाले समय में किसानों को आर्थिकी में इजाफा होगा। किसानों को तिमूर की खेती के लिए प्रोत्साहित करने को सेटेलाइट सेंटर में प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
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बर्थवाल ने बताया कि बरसात सीजन में गणकोट, पसमा, आगांव और मुनस्यारी क्षेत्र में 2000 से अधिक पौधों का रोपण किया गया है। पसमा स्थित हिमग्रेस फार्म में तिमूर के साथ ही अन्य सगंध पौधे भी लगाए जा रहे हैं। सेटेलाइट सेंटर में वर्तमान में लेमनग्रास, लेमन बाम, वन तुलसी, डेमस्क गुलाब, तिमूर, तेजपत्ता, सिट्रोनेला, गनियाग्रास, पिपरमेंट का प्रदर्शन क्षेत्र भी बनाया गया है। बताया कि किसान और स्कूली बच्चे सेंटर का भ्रमण कर सकते हैं।
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इतनी खूबियों से भरपूर होता है तिमूर:
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में पाया जाने वाला तिमूर औषधीय गुणों से भरपूर होता है। इस पौधे का वैज्ञानिक नाम जेनथोजायलम अर्मेटम है। इस पेड़ की पत्तियां, टहनी, बीज और फल सभी फायदेमंद होते हैं। तिमूर के बीजों में पोटेशियम की मात्रा भरपूर होती है। इसके सेवन से बीपी नियंत्रित रहता है। इसके बीजों का प्रयोग मसालों के रूप में किया जाता है। पहाड़ के लोग खाना बनाने के लिए तिमूर के बीजों का इस्तेमाल मसाले के रूप में करते हैं। जाड़ों में इसका सूप पिया जाता है। इसकी चटनी भी बनाई जाती है जो खाने में बेहद स्वादिष्ट होती है। दांत दर्द में भी इसका उपयोग किया जाता है। तिमूर की लकड़ी का आध्यात्मिक महत्त्व भी है। इसकी लकड़ी को शुभ माना जाता है। तिमूर की लकड़ी को मंदिरों और धामों में प्रसाद के रूप में भी चढ़ाया जाता है। साधु सन्यासी इसके तने को लाठी के रूप में उपयोग में लाते हैं।