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पानी के वेग से पिसा गेहूं थाली में बढ़ा रहा पौषक तत्वों की मात्रा
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कनालीछीना के डूंगरी में पारंपरिक घराट।
- फोटो : PITHORAGARH
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कनालीछीना (पिथौरागढ़)। पहाड़ के लोग प्रकृति के बेहद करीब होते हैं। आधुनिक दौर में भी यहां के लोगों ने जीवनयापन के पारंपरिक तरीकों को नहीं छोड़ा है। कनालीछीना ब्लॉक के डुंगरी गांव के 300 परिवार आज भी अपने पूर्वजों की खोज पारंपरिक घराट से आटा पिसाई कर आज भी उसे जीवंत बनाए हुए हैं।
घराट में पिसे आटे में पौष्टिक तत्व बरकरार रहते हैं। धीमी गति से चलने से आटा 100 फीसदी सुरक्षित रहता है और आटा स्वादिष्ट भी होता है। गांव का प्रत्येक परिवार हर माह लगभग 30 किलो आटा पिसाई करता है।
इससे पूरे गांव की हर माह करीब 90 हजार रुपये की बचत होती है। 30 किलो आटा पिसाई में करीब डेढ़ घंटे का समय लगता है। ग्रामीणों ने कहा पूर्वजों की ये बड़ी खोज है। सरकार को इस पारंपरिक आटा पिसाई पद्धति को संरक्षित करने के लिए कार्य करना चाहिए।
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ऐसे होती है पिसाई
कनालीछीना। घराट में आटा पिसाई बेहद आसान है। गूल से पानी लाकर घट की पंखुड़ियां पर पानी गिराया जाता है। इसके बाद पंखुड़ियां तेज गति से चलती हैं और दो पाटों के बीच गेहूं पिसता है। प्रत्येक 10 वर्ष में ग्रामीण घराट का सुधारीकरण करते हैं। इससे पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं होता है। संवाद
पूर्वजों की ये खोज आज भी अस्तित्व बनाए हुए है। इस तरह की पद्धति को सरकार को बढ़ावा देना चाहिए। घराटों के संरक्षण की जरूरत है। इससे पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं है। - राजेश मेहता
300 परिवार माह में 90 हजार से अधिक की बचत करते हैं, जबकि बिजली मशीन से पिसाई का प्रति किलो तीन से चार रुपये लिया जाता है। बिजली नहीं होने पर आटा पिसाई ठप हो जाती है। मगर घराट में ऐसा नहीं है। - पुष्कर सिंह
डुंगरी गांव के लोग आज भी घराट से आटा पिसाई की परंपरा केे बनाए हुए हैं। कई गांव में ये परंपरा बंद हो चुकी है। सरकार को इसके संरक्षण के लिए कार्य करने की जरूरत है। - खुशाल सिंह
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घराट में पिसे आटे में पौष्टिक तत्व बरकरार रहते हैं। धीमी गति से चलने से आटा 100 फीसदी सुरक्षित रहता है और आटा स्वादिष्ट भी होता है। गांव का प्रत्येक परिवार हर माह लगभग 30 किलो आटा पिसाई करता है।
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इससे पूरे गांव की हर माह करीब 90 हजार रुपये की बचत होती है। 30 किलो आटा पिसाई में करीब डेढ़ घंटे का समय लगता है। ग्रामीणों ने कहा पूर्वजों की ये बड़ी खोज है। सरकार को इस पारंपरिक आटा पिसाई पद्धति को संरक्षित करने के लिए कार्य करना चाहिए।
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ऐसे होती है पिसाई
कनालीछीना। घराट में आटा पिसाई बेहद आसान है। गूल से पानी लाकर घट की पंखुड़ियां पर पानी गिराया जाता है। इसके बाद पंखुड़ियां तेज गति से चलती हैं और दो पाटों के बीच गेहूं पिसता है। प्रत्येक 10 वर्ष में ग्रामीण घराट का सुधारीकरण करते हैं। इससे पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं होता है। संवाद
पूर्वजों की ये खोज आज भी अस्तित्व बनाए हुए है। इस तरह की पद्धति को सरकार को बढ़ावा देना चाहिए। घराटों के संरक्षण की जरूरत है। इससे पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं है। - राजेश मेहता
300 परिवार माह में 90 हजार से अधिक की बचत करते हैं, जबकि बिजली मशीन से पिसाई का प्रति किलो तीन से चार रुपये लिया जाता है। बिजली नहीं होने पर आटा पिसाई ठप हो जाती है। मगर घराट में ऐसा नहीं है। - पुष्कर सिंह
डुंगरी गांव के लोग आज भी घराट से आटा पिसाई की परंपरा केे बनाए हुए हैं। कई गांव में ये परंपरा बंद हो चुकी है। सरकार को इसके संरक्षण के लिए कार्य करने की जरूरत है। - खुशाल सिंह