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फूल देई छम्मा देई, देली द्वार भर भकार
कालिका रावल/अमर उजाला, पिथौरागढ़
Updated Tue, 14 Mar 2017 09:51 PM IST
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पिथौरगढ़ में फुलदेई मौक पर देलि पूजन करनि नानतिन
- फोटो : अमर उजाला
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चैताक (चैत्र) महैणकि संक्रांतिक दिन अपण पहाड़ में फूलदेई लोकपर्व मनाई जांछ। आधुनिकताकि होड़ में यो पर्व ले लगातार हाशिये में जाण लागि रो। फूलदेई आब गौन तक सीमित रै गे। नगर, शहर में ये परंपरा लोग भुलण बैगईं।
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यो त्यार वसंत ऋतु स्वागत में मनाई जांछ। नान चेली (लड़कियां) रात्तै स्नानाक बाद आसपासाक क्षेत्र बटि प्योलि, बुरांस, आड़ू, खुमानी, पुलम आदिक फूलन चुनि भेर देली (घर का मुख्य द्वार) पूजन करनान और कूनान फूल देई, छम्मा देई, देली द्वार भर भकार, ये देलीस बारम्बार नमस्कार। गृहस्वामी नानतिननकि थालि में रुपै, गुड़, चावल राखनान। पहाड़कि विशिष्टता कई जालि कि यांक लोग देलीक ले पूजन करनान।
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आब यो पर्व गौन तकै सामित रैग्यो। नगर और शहराक सभ्य कई जानेर लोग ये परंपरा भुलण लागि ग्यान। नई पीढ़ी लोगन ये पर्वकि नै त जानकारी छ और न ये त्याराक प्रति कोई रुझान रैग्यो। अपण बोली, भाषाक उत्थानाक दिशा में काम करनई लोक कवि जनार्दन उप्रेती (जन्नू दा) कूनन कि अपण धर्म, संस्कृति, परिपाटी बटि मुख मोडन कतई ठीक नहांति। अपण रीति-रिवाज, परंपराक उत्थानकि तै लोगन अघिल ऊण चैंछ। यदि लोग नी जागाल तो ये परंपरा पहाड़ि लोग भुलि जाल, जो ठीक बात नी भै। परंपरा संरक्षणाक लिजि सबूनकैं जागरूक हुण पड़ौल।
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भिटौलीक ले हैगे शुरुआत
चैताक संक्रांति बटि बैणीन भिटौल दिणकि शुरुआत है जांछि। लोग व्याहता बहिनन भिटौलि दिनान। पैली जमान में बैणिन पकाई त्यार (पकवान) दी जांछि, धोति, साड़ी दी जांछि। कच्च राशन दीनैकि ले परंपरा छी। बाद-बाद में मनीआडर बटि भिटौलीकि रकम भेजणाक रिवाज चलौ। आब बैणिनाक खात में लोग रुपै डालण बै गई।