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सरकार की वादाखिलाफी से गहरा हुआ बस्तड़ी आपदा पीड़ित का दर्द
संजू पंत/अमर उजाला, डीडीहाट
Updated Thu, 29 Jun 2017 10:22 PM IST
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बस्तड़ी आपदा में घायल मंजू भट्ट को सहारा देकर लाते परिजन
- फोटो : अमर उजाला
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बस्तड़ी की आपदा ने कई जिंदगियों को समाप्त किया तो कुछ को अपंग बनाकर छोड़ दिया। 30 जुलाई 2016 की रात मलबे में दबी मंजू भट्ट को नौ घंटे बाद एक जुलाई को मलबे से जिंदा बाहर तो निकाल लिया गया, लेकिन अब वह अपाहिज जिंदगी जीने को मजबूर हो गई हैं। सरकार ने घायलों का मुफ्त में इलाज कराने का एलान तो किया, लेकिन कुछ समय बाद वह इस वादे को भूल गई।
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बस्तड़ी के मोहन चंद्र भट्ट का मकान भी आपदा की भेंट चढ़ा था। खुद मोहन चंद्र, उनकी पत्नी मंजू और बेटी सुनीता मलबे में दब गए। रेस्क्यू टीम ने इन तीनों को मलबे से सुरक्षित निकाल तो लिया, लेकिन मंजू भट्ट की गंभीर हालत को देखते हुए एक जुलाई को आईटीबीपी अस्पताल मिर्थी ले जाया गया। अगले दिन उनको जिला अस्पताल रेफर किया गया। जब जिला अस्पताल में भी इलाज नहीं हो पाया तो मंजू भट्ट को चार जुलाई को सुशीला तिवारी अस्पताल हल्द्वानी ले जाना पड़ा। पांच महीने तक सुशीला तिवारी अस्पताल में रहने के बाद मंजू भट्ट को डॉक्टरों ने यह कहकर घर भेज दिया कि घर पर चलने-फिरने से धीरे-धीरे स्वास्थ्य में सुधार आ जाएगा। मंजू का बांया पांव मलबे में दबने से टूट गया था। पांच महीने अस्पताल में रहने के बाद भी डॉक्टर मंजू को चलने फिरने लायक स्थिति में नहीं ला पाए।
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मंजू के पति मोहन चंद्र ने बताया कि सरकार ने इलाज के लिए एक लाख रुपये देने की घोषणा की थी। यदि यह धनराशि मिल जाती तो वह एम्स में इलाज कराने जाते। उनके पास पैसा नहीं है। बस अपंग हो चुकी पत्नी की सेवा में ही पूरे परिवार का दिन बीत जाता है।
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अस्पताल में मरहम-पट्टी की सुविधा तक नहीं
बस्तड़ी के पास स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सिंघाली में मरहम-पट्टी तक की सुविधा नहीं है। अस्पताल में लंबे समय से डॉक्टर नहीं है। आपदा के तुरंत बाद प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा था कि सिंघाली अस्पताल में डॉक्टर, अन्य स्टाफ की तैनाती की जाएगी, लेकिन अब तक वहां पर कर्मचारियों की तैनाती नहीं हो पाई है।
इससे तो मलबे में दबकर मर जाती : मंजू
अपंग हो चुकी मंजू को खुद की जिंदगी को लेकर इतनी निराशा घर कर चुकी है कि वह बार-बार कहती हैं कि मलबे से जिंदा न निकलती तो अच्छा था। अब तो उनको शौच के लिए जाने के लिए भी सहारे की जरूरत है। पति मोहन चंद्र भट्ट पत्नी की इस हालत के कारण घर से बाहर नहीं जा पाते। मंजू की इस हालत को लेकर गांव के लोगों में सरकार के प्रति भारी गुस्सा है।