फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Pithoragarh News ›   Drummer artist

महेश दा के बगैर उत्सव, लोक आयोजन फीके

Mon, 04 Sep 2017 11:07 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़ Updated Mon, 04 Sep 2017 11:07 PM IST
विज्ञापन
Drummer artist
ढोलवादक कलाकार - फोटो : अमर उजाला

पिथौरागढ़। महेश दा के नाम से मशहूर महेश राम 39 साल से विवाह और अन्य पारिवारिक आयोजनों के साथ ही लोक विधा जागर, घड़ेली आदि में ढोल, नगाड़ा बजाकर आयोजनों में चार चांद लगाते हैं। बुढ़ापा आते देख बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। महेश दा इस फन के ऐसे फनकार हैं कि उनके बगैर पारिवारिक उत्सव, लोक आयोजन फीके नजर आते हैं। कई दिक्कतों को झेल रहे महेश दा इस विधा में आने वाली पीढ़ी को परिपक्व बनाने की मंशा रखते हैं। ढोल वादन सीख चुके उनके बड़े बेटे को इस पेशे में कैरियर नहीं दिखता, छोटा बेटा पिता से इस विधा की शिक्षा ले रहा है। महेश दा चाहते हैं कि वाद्ययंत्र की शिक्षा के लिए संस्थान खुलने चाहिए। जिनसे इस विधा के जानकारों को रोजगार मिल सके।  

विज्ञापन


12 वर्ष की उम्र से अपने पिता कालू राम से ढोल वादन की कला सीखने वाले जिला मुख्यालय से सटे सल्मोड़ा निवासी 51 वर्षीय महेश राम इस विधा में पारंगत हैं। पारिवारिक, धार्मिक आयोजनों में ढोल वादक के रूप में महेश राम सल्मोड़ा, खूनी, गैंठना, सुजई, ओड़माथा, जाजरदेवल, उर्ग, सातशिलिंग, बीसाबजेड़, देवल, मूलागाड़ समेत तमाम गांवों में लोगों की पहली पसंद होते हैं। जागा, जागर, चौरासी, बैसी, घड़ेली आदि धार्मिक आयोजनों में महेश दा जब देवताओं का आह्वान करते हैं तो देवडांगरों को तो छोड़िए आम लोगों के शरीर में कंपन होने लगती है। हाइस्कूल तक पढ़े महेश राम मुंबई, दिल्ली, देहरादून समेत तमाम शहरों में ढोल, नगाड़ा वादन की प्रस्तुति दे चुके हैं।
विज्ञापन


पिथौरागढ़ के वर्ष 2000 के छलिया महोत्सव में उनके दल को पहला स्थान मिला था। महेश राम इस विधा को आने वाली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं। उन्होंने अपने 25 वर्षीय बेटे रोशन को इस विधा की शिक्षा दी लेकिन रोशन को इस पेशे में भविष्य नहीं दिखा। उसने ढोल वादन का काम छोड़ दिया। छोटे बेटे राहुल (23) को 13 साल की उम्र से महेश ढोल वादन के गुर सिखा रहे हैं। राहुल अपने पिता के साथ ढोल वादन करते हैं। महेश राम वह अपने साथियों को भी इस विधा की जानकारी देते हैं। महेश ढोल, नगाड़े के साथ ही बेहतरीन हुड़का बजाते हैं। महेश राम परिवार के भरण पोषण के लिए पशुपालन भी करते हैं। कहते हैं कि वाद्ययंत्र बजाने वालों को राज्य सरकार 60 साल की उम्र के बाद पेंशन दे रही है। पेंशन 50 साल की उम्र के बाद दी जानी चाहिए, इस उम्र के बाद ढोल वादन कठिन हो जाता है।  
विज्ञापन
विज्ञापन

 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed