आने वाली पीढ़ी के लिए शोध के द्वार खोल गए डॉ. पांगती
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इतिहासकार, लेखक, शिक्षक डॉ. शेर सिंह पांगती ने लेखन के क्षेत्र में इतना बड़ा संसार खड़ा किया है कि आने वाली पीढ़ी के लिए शोध के द्वार तैयार हो गए हैं। उन्होंने लेखन के माध्यम से भोटिया जनजाति के संरक्षण, संवर्द्धन का काम किया। साथ ही उनके पुरोहितों की वंशावली तक तैयार कर दी। उनके निधन की सूचना से ऐसा लगता है कि गंभीर लेखन, चिंतन के एक युग का अवसान हो गया है। खास बात यह थी कि वह जिंदादिल इंसान थे। उनके अंदर मानवीयता कूट-कूट कर भरी थी। खुद के जीवन में भोगे सच को उन्होंने इस तरह व्यवहार में उतारा कि वह आने वाली पीढ़ी को रोशनी दिखाने वाला साबित हो गया।
डॉ. पांगती के साथ काम करने वाले और उनको करीब से जानने वालों ने उनके व्यक्तित्व की कई विशेषताओं की जानकारी दी। जो अध्ययन डॉ. पांगती ने किया था वह मील का पत्थर साबित हो गया। वैसे जोहारी समाज में इस तरह की सृजनशीलता वाले व्यक्तियों की कोई कमी नहीं रही है। पंडित नैन सिंह रावत से लेकर डॉ. आरएस टोलिया तक सभी ने शोध को नया आयाम दिया था, लेकिन डॉ. पांगती का काम विलक्षण था। डॉ.पांगती जोहारी संस्कृति के संरक्षण के अलावा घूमने के शौकीन भी थे। डॉ.पांगती जब भी विदेश गए, वहां से वह कोई न कोई वस्तु जरूर ले आते थे और उसे संग्रहालय में रखते थे, ताकि लोगों को उसके बारे में जानकारी हो सके।
जोहार की संस्कृति के मर्मज्ञ डॉ. पांगती को तिब्बती भाषा का भी ज्ञान था। 1963-64 में जब तिब्बती शरणार्थी बनकर भारत के सानदेव घोरपट्टा डीडीहाट में आए थे, तो तिब्बती भाषा के एकमात्र जानकार होने के कारण इन्होंने तिब्बतियों को पढ़ाया भी था। साथ ही अनुवादक का काम भी किया।
वह चुपचाप काम करने पर विश्वास करते थे
बीस सूत्रीय कार्यक्रम के पूर्व निदेशक यतेंद्र सिंह पांगती का कहना है कि डॉ. शेर सिंह पांगती चुपचाप काम करने पर विश्वास करते थे। यदि ऐसा नहीं होता तो उनकी रचनाओं को अब तक राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गए होते। अनुशासन पर यकीन करने वाले डॉ. पांगती ने अपने पुरोहितों की वंशावली तक तैयार कर दी। अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं है।
सामाजिक जीवन को समझने वाले शिक्षक थे
उत्तराखंड के पूर्व स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. जनार्दन पांगती तो डॉ. शेर सिंह पांगती को अपना गुरु मानते हैं। बताते हैं कि कक्षा छह से पढ़ाई के वह दौरान डॉ. पांगती के घर पर ही रहे। डॉ. पांगती ऐसे शिक्षक थे, जिनको सामाजिक जीवन की गहराई से जानकारी थी। इतना कठिन परिश्रमी व्यक्ति उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा। वह कहते हैं कि डॉ. शेर सिंह पांगती ने नई पीढ़ी को रोशनी दी थी।
अपना घर बनाते समय खुद पत्थर तोड़ते थे
मुनस्यारी। पूर्व शिक्षक हरीश चंद्र द्विवेदी का कहना है कि उनकी तैनाती डॉ. शेर सिंह पांगती के ही कार्यकाल में हुई थी। जीवन में ऐसा मेहनती व्यक्ति उन्होंने भी कभी नहीं देखा। उन्होंने अपना घर बनाते समय खुद पत्थर तोड़े थे। वह पत्थरों को कंधे पर उठाकर ले जाते थे। वह लेखक, विचारक, कहानीकार, नाटककार, इतिहासकार और एक अच्छे इंसान थे। उनका साहित्य हमेशा अमर रहेगा।
वह सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक थे
मुनस्यारी। भारत संचार निगम के पूर्व अधिकारी चंद्र सिंह पांगती का कहना है कि डॉ. शेर सिंह पांगती ने मुनस्यारी की रामलीला को प्रोत्साहित करने में बड़ा योगदान दिया। दरकोट में लोककला केंद्र की स्थापना में भी उन्होंने सहयोग दिया था। वह सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक थे। उनके मन में जोहारी समाज के उत्थान की चिंता थी। पांगती समिति का गठन उनकी ही प्रेरणा से हुआ था।