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विस्थापन और पुनर्वास भी होगा अहम मुद्दा

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Mon, 06 Dec 2021 11:36 PM IST
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Displacement and resettlement will also be an important issue
Displacement and resettlement will also be an important issue
पिथौरागढ़। चुनावों के नजदीक आते ही राजनीतिक दलों के नेता तमाम मुद्दों के साथ जनता के बीच पहुंचने लगे हैं। सीमांत पिथौरागढ़ जिले में आपदा पीड़ितों का विस्थापन बड़ा मुद्दा रहा है। जिले में सौ से अधिक गांवों को विस्थापित करने की जरूरत है। चुनावों में आपदा प्रभावितों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने के साथ ही तमाम तरह के सब्जबाग दिखाए जाते हैं लेकिन हाल के वर्षों में खतरे की जद में आने वाले गांवों को तो छोड़िए पिछले दो दशकों से तमाम विपरीत हालातों में जी रहे परिवारों को भी आज तक विस्थापित नहीं किया जा सका है। ऐसे में यह तय है कि 2022 में होने वाले विधान सभा चुनावों में विस्थापन, पुनर्वास प्रमुख मुद्दा बनेगा।
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उत्तराखंड राज्य का चीन और नेपाल से सटा पिथौरागढ़ जिला पिछले दो दशकों से गंभीर प्राकृतिक आपदाओं को झेल रहा है। साल दर साल मानसून काल में जमीनों के दरकने से कुछ गांवों का अस्तित्व मिट गया तो अधिकांश गांव ऐसे हैं जिनका आपदाओं ने भूगोल बदल दिया। मुनस्यारी का क्वीरी जिमियां गांव भूस्खलन से दो हिस्सों में बंट गया। आज तक इस गांव के लोगों का पुनर्वास नहीं हुआ। क्वीरीजिमिया के 22 परिवारों ने गांव छोड़ दिया है। कुलथम, धापा, दुम्मर, भंडारीगांव, नया बस्ती, गोल्फा और मदरमा के 144 परिवारों ने पुनर्वास की उम्मीद में पलायन कर लिया। वर्ष 2013 में आई आपदा ने काली नदी के किनारे बसे गांवों को निगल लिया तो हिमालयी नदी गोरी ने मदकोट कस्बे का भूगोल बदल दिया। वर्ष 2020 में बंगापानी तहसील के टांगा सहित आधा दर्जन गांवों को तबाह कर दिया। जोशा गांव पूरी तरह से दरक गया है। भदेली गांव के लोग मौत के मुहाने पर रह रहे हैं। दो से छह इंच तक चौड़ी दरारें पड़े घरों में रहने को मजबूर इन लोगों का सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वास नहीं किया जा सका है। 1998 में आपदा ने मालपा गांव का अस्तित्व मिटा दिया था। कई दशकों से आपदा की विभीषिका से जूझ रहे धारचूला के भी सैकड़ों परिवारों को पुनर्वास का इंतजार है। तांकुल, कनार, छलमाछिलासो, हिमखोला, जिप्ती, धारपांगू, रांथी, जम्कू, कुलथम, सेनर, तोमिक, तल्ला भैंसकोट, बमनगांव खालसा, छाना, कोट्यूड़ा, गोठी, बाता, हुड़की, कनार, मेतली, गैला, लोद, जोशा, धापा, मालोपाती, सिलौनी, आकोट, नयाबस्ती, जुम्मा, साड़ा, गोल्फा, सानीखेत, गर्गुवा, बुंगबुंग, सुवा, टांगा, न्वाली ऐसे गांव हैं जिन पर हर बरसात खतरा मंडराने लगता है। इनमें से कनार, छलमा छिलासो और तांकुल को छोड़कर अभी अन्य गांवों के विस्थापन की कवायद नहीं हुई है। पिछले बीस साल में 15 से अधिक बार बादल फटने की घटनाओं में अब तक 360 से ज्यादा लोग असमय जान गवां चुके हैं। आपदा काल में खतरे की जद में आए परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने का दावा करने के साथ ही कुछ धनराशि देकर मरहम लगाने का काम तो किया जाता है लेकिन उसके बाद जमीन चयन से आगे की कवायद नहीं हो पाती है। ऐसे में हर बार बारिश में आपदा पीड़ितों को जंगलों के बीच टेंटों में रात गुजारनी पड़ती है। मुनस्यारी के भदेली गांव के आपदा पीड़ितों ने बताया कि उन्हें जंगल में तीन किमी दूर विस्थापित होने के लिए कहा जा रहा है। जबकि सरकार को सुरक्षित स्थान के साथ सुविधाजनक स्थल भी पुनर्वास के लिए उपलब्ध कराना चाहिए था। आपदा पीड़ितों का कहना है कि चुनावों में कोरे आश्वासन नहीं चाहिए।
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