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ढर्रे पर नहीं आया बंगापानी तहसील का काम
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़
Updated Sun, 11 Dec 2016 10:03 PM IST
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केएमवीएम के गेस्टहाउस में चल रहा बंगापानी तहसील
- फोटो : अमर उजाला
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11 फरवरी 2015 से शुरू हुई बंगापानी तहसील का कामकाज अब तक ढर्रे पर नहीं आ पाया है। शुरुआत में जब बंगापानी में तहसील कार्यालय स्थापित करने के लिए कोई भवन नहीं मिला तो कुमाऊं मंडल विकास निगम के गेस्टहाउस में तहसील का बोर्ड लगा दिया गया और बाद में इसी गेस्टहाउस में तहसील का कामकाज चलने लगा, लेकिन हालात आज भी नहीं सुधरे हैं। इस तहसील को लेकर शुरुआत से ही अनिश्चय का माहौल बना रहा। यह अनिश्चय अब भी समाप्त नहीं हुआ है। जिन गांवों के लिए यह तहसील असुविधा का कारण बन रही है, वह इससे हटना चाहते हैं।
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बता दें कि लोगों की बार-बार आपत्ति के बाद प्रदेश सरकार ने अधिसूचना जारी कर पिछले माह बंगापानी तहसील से मदकोट, गैला, राप्ती, निरतोली, बोना, गोल्फा गांवों को हटाकर फिर से मुनस्यारी में ही शामिल कर दिया। बंगापानी तहसील में शामिल होने का लोग इसलिए विरोध कर रहे थे, क्योंकि उनका मुनस्यारी तहसील कार्यालय ज्यादा नजदीक पड़ता है।
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वहीं, बंगापानी तहसील का कामकाज अब तक भी ढर्रे पर नहीं आ पाया है। लोगों को प्रमाणपत्रों के लिए मुनस्यारी या धारचूला के चक्कर काटने पड़ते हैं। काफी प्रयास के बाद अब जाकर तहसील में स्थायी तहसीलदार की तैनाती तो कर दी गई है, लेकिन लोगों के काम सही ढंग से नहीं हो पा रहे हैं। तहसील में एक रजिस्ट्रार कानूनगो और एक लिपिक काम कर रहा है। आफिस के अन्य काम को निपटाने के लिए होमगार्ड के चार जवान भी रखे गए हैं। बंगापानी तहसील को भी राजनैतिक कारणों से ही स्थापित किया गया था। लोगों का कहना है कि जगह-जगह तहसीलें खोलने के बजाए पुरानी तहसीलों में ज्यादा सुविधाएं जुटाई जाएं।
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सरकार जल्दी बनाएगी तहसील भवन
विधायक प्रतिनिधि हीरा सिंह चिराल का कहना है कि सरकार जल्द ही बंगापानी में तहसील भवन का निर्माण करेगी। जमीन के चयन का काम शुरू हो गया है। वह कहते हैं कि दूरस्थ क्षेत्र की इस तहसील से लोगों को लाभ दिलाने के लिए प्रयास किए जाएंगे। तहसील में स्टाफ की तैनाती की जाएगी।
तहसील खोलने में जल्दबाजी कर दी
मदकोट निवासी जगदीश उप्रेती का कहना है कि बंगापानी तहसील खोलते समय जल्दबाजी कर दी। इसका सीमांकन गलत तरीके से किया गया। इस कारण लोग विरोध में उतर आए थे। वह कहते हैं कि यदि तहसील का सीमांकन सही तरीके से किया जाता तो ग्रामीणों को आपत्ति भी नहीं होती। शामिल किए गए गांवों को हटाना प्रशासनिक कमी को दर्शाता है।