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आज भी जीवटता से जीते हैं ला झेकला के बहादुर सिंह
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बहादुर सिंह राणा।
- फोटो : PITHORAGARH
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सात अगस्त 2009 को बादल फटने की घटना में परिवार को नौ सदस्यों को गंवाने वाले बहादुर सिंह (87) आज भी जीवटता से जी रहे हैं। उनका कहना है कि नियति से कौन जीत सकता है। जब तक जिंदा हूं अपना कर्म करूंगा। हादसे में 43 लोग मलबे में जिंदा दफन हो गए थे।
सात अगस्त की रात को प्रकृति ने लाझेकला में मौत का तांडव मचाया था। रात को बादल फटने से गांव के 38 लोगों की मौत हो गई थी। हादसे में रांथी के रूमीदौला गांव के पांच लोग भी काल कवलित हुए थे। लाझेकला गांव के बहादुर सिंह राणा के परिवार में दो पुत्र, बहुएं, पांच पौत्र-पौत्रियां समेत नौ लोगों को प्रकृति लील गई थी, जबकि बहादुर सिंह और उनकी पत्नी इस दर्दनाक हादसे में बच गए थे। हादसे के करीब पांच माह बाद बहादुर सिंह की पत्नी की भी मौत हो गई। बहादुर सिंह की दो बेटियां हैं उनका होकरा और क्वीटी के मोड़म गांव में विवाह हुआ है।
गांव में बहादुर सिंह पुरानी दर्दनाक यादों के साथ अकेले ही अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। कभी-कभी उनकी बेटियां देखरेख के लिए आ जाती हैं। वे सुबह स्नान, ध्यान के बाद खेतीबाड़ी में जुड़ जाते हैं। बुधवार को जब उनका हालचाल जानने यह संवाददाता गांव पहुंचा तो बहादुर सिंह धान की निराई में व्यस्त थे। दस साल पूर्व हुए हादसे के बारे में पूछने पर आंखों में आंसू लिए बोले, नियति के आगे हम सब बेबस हैं। कहा कि समय व्यतीत हो रहा है। हादसे को याद कर उनकी आंखें सब कुछ बयां कर देती हैं।
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इस दौरान गांव में दैवीय आपदा में काल कवलित हुए लोगों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में जगत बथ्याल, हरीश कुंवर, सुरेंद्र सिंह, कवींद्र सिंह, पूरन सिंह, कमल किशोर राणा, गोविंद सिंह, हयात सिंह, जगत सिंह, धरम सिंह, लक्ष्मण सिंह, पार्वती देवी, नंदी देवी, दरपान सिंह समेत कई ग्रामीण मौजूद रहे।
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सात अगस्त की रात को प्रकृति ने लाझेकला में मौत का तांडव मचाया था। रात को बादल फटने से गांव के 38 लोगों की मौत हो गई थी। हादसे में रांथी के रूमीदौला गांव के पांच लोग भी काल कवलित हुए थे। लाझेकला गांव के बहादुर सिंह राणा के परिवार में दो पुत्र, बहुएं, पांच पौत्र-पौत्रियां समेत नौ लोगों को प्रकृति लील गई थी, जबकि बहादुर सिंह और उनकी पत्नी इस दर्दनाक हादसे में बच गए थे। हादसे के करीब पांच माह बाद बहादुर सिंह की पत्नी की भी मौत हो गई। बहादुर सिंह की दो बेटियां हैं उनका होकरा और क्वीटी के मोड़म गांव में विवाह हुआ है।
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गांव में बहादुर सिंह पुरानी दर्दनाक यादों के साथ अकेले ही अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। कभी-कभी उनकी बेटियां देखरेख के लिए आ जाती हैं। वे सुबह स्नान, ध्यान के बाद खेतीबाड़ी में जुड़ जाते हैं। बुधवार को जब उनका हालचाल जानने यह संवाददाता गांव पहुंचा तो बहादुर सिंह धान की निराई में व्यस्त थे। दस साल पूर्व हुए हादसे के बारे में पूछने पर आंखों में आंसू लिए बोले, नियति के आगे हम सब बेबस हैं। कहा कि समय व्यतीत हो रहा है। हादसे को याद कर उनकी आंखें सब कुछ बयां कर देती हैं।
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इस दौरान गांव में दैवीय आपदा में काल कवलित हुए लोगों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में जगत बथ्याल, हरीश कुंवर, सुरेंद्र सिंह, कवींद्र सिंह, पूरन सिंह, कमल किशोर राणा, गोविंद सिंह, हयात सिंह, जगत सिंह, धरम सिंह, लक्ष्मण सिंह, पार्वती देवी, नंदी देवी, दरपान सिंह समेत कई ग्रामीण मौजूद रहे।