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Pithoragarh News: गंगोलीहाट के महाकाली मंदिर में 24 फरवरी को चीर बंधन
Fri, 20 Feb 2026 11:53 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Fri, 20 Feb 2026 11:53 PM IST
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गंगोलीहाट (पिथौरागढ़)। अष्टमी पर्व पर 24 फरवरी को महाकाली मंदिर में चीर बांधी जाएगी। 27 फरवरी को एकादशी के दिन रंग पड़ने के बाद गांवों में होली गायन की धूम शुरू हो जाएगी।
कुमाऊं में होली मनाने की अपनी अलग ही परंपरा है। देश के अन्य भागों में जहां एक दिन की होली होती है वहीं कुमाऊं में पौष मास के पहले रविवार से बैठकी होली गायन शुरू हो जाता है।
विभिन्न रागों में गाए जाने वाली इन होली गीतों को गाने का दौर चैत मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि (छलड़ी) तक रहता हैं। होली गीत गाते समय रागों के साथ पदों का ध्यान भी रखा जाता है, जिस तरह राग गाने का एक निश्चित समय होता है ठीक उसी तरह पद गाने का भी समय तय है।
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पौष मास के पहले रविवार से गाए जाने वाले होली के बोल भले ही सभी राग के हों पर यह मात्र विष्णुपदी होते हैं। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मंदिर में चीर बांधने के बाद अबीर गुलाल से होली खेलनी शुरू हो जाती है।
इसके 3 दिन बाद एकादशी के दिन गांव-गांव में चीर बांधने के बाद रंग की होली खेलने का सिलसिला छलड़ी तक जारी रहता है। इस दौरान बैठकी होली के साथ ही घर-घर जाकर खड़ी होली के गीत गाए जाते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में मोटी होली या बंजारा कहा जाता है। रंग की होली शुरू होते ही पद भी बदल बदल जाते हैं।
रंग की होली में श्रृंगार रस से भरे होली के गीत अधिक गाए जाते हैं। कुछ स्थानों में महिलाएं और पुरुष एक साथ होली गाते हैं। चीर बंधने के बाद बंदिश नहीं रहती, तब लोगों के रहन-सहन, फसलों की पैदावार, श्रृंगार के दोनों पक्ष संयोग और वियोग के गीत गाए जाते हैं। किसी नायिका के श्रृंगार से वर्णन को होली के गीतों में इस तरह पिरोया जाता है। एकादशी से छलड़ी तक जैसे-जैसे दिन बीतते रहते हैं वैसे ही होली भी जवां होती रहती है। होली का समापन 4 मार्च को होगा। संवाद
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कुमाऊं में होली मनाने की अपनी अलग ही परंपरा है। देश के अन्य भागों में जहां एक दिन की होली होती है वहीं कुमाऊं में पौष मास के पहले रविवार से बैठकी होली गायन शुरू हो जाता है।
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विभिन्न रागों में गाए जाने वाली इन होली गीतों को गाने का दौर चैत मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि (छलड़ी) तक रहता हैं। होली गीत गाते समय रागों के साथ पदों का ध्यान भी रखा जाता है, जिस तरह राग गाने का एक निश्चित समय होता है ठीक उसी तरह पद गाने का भी समय तय है।
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पौष मास के पहले रविवार से गाए जाने वाले होली के बोल भले ही सभी राग के हों पर यह मात्र विष्णुपदी होते हैं। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मंदिर में चीर बांधने के बाद अबीर गुलाल से होली खेलनी शुरू हो जाती है।
इसके 3 दिन बाद एकादशी के दिन गांव-गांव में चीर बांधने के बाद रंग की होली खेलने का सिलसिला छलड़ी तक जारी रहता है। इस दौरान बैठकी होली के साथ ही घर-घर जाकर खड़ी होली के गीत गाए जाते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में मोटी होली या बंजारा कहा जाता है। रंग की होली शुरू होते ही पद भी बदल बदल जाते हैं।
रंग की होली में श्रृंगार रस से भरे होली के गीत अधिक गाए जाते हैं। कुछ स्थानों में महिलाएं और पुरुष एक साथ होली गाते हैं। चीर बंधने के बाद बंदिश नहीं रहती, तब लोगों के रहन-सहन, फसलों की पैदावार, श्रृंगार के दोनों पक्ष संयोग और वियोग के गीत गाए जाते हैं। किसी नायिका के श्रृंगार से वर्णन को होली के गीतों में इस तरह पिरोया जाता है। एकादशी से छलड़ी तक जैसे-जैसे दिन बीतते रहते हैं वैसे ही होली भी जवां होती रहती है। होली का समापन 4 मार्च को होगा। संवाद