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जीर्णोद्धार के बाद बिरमथल धारे का पानी घटा

Tue, 11 Apr 2017 10:12 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, थल
ब्यूरो/अमर उजाला, थल Updated Tue, 11 Apr 2017 10:12 PM IST
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After the renovation, the water of Barmathal Dhar decreases
थल के बिरमथल धारे में पानी भरने पहुंची महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

वर्ष 2007 में ग्राम पंचायत की मद से डीडीहाट रोड पर स्थित प्राचीन बिरमथल धारे की मरम्मत की गई थी। इसके बाद इस धारे के पानी में कमी आने लगी। गर्मी के समय धारे से पानी की पतली धार निकलती है। इन दिनों भी पानी बहुत कम हो गया है। थल बाजार के साथ-साथ आने जाने वाले यात्रियों, बिरमथल गांव के लोगों की प्यास बुझाने वाले इस धारे से रात दस बजे तक भी लोग पानी भरते हैं।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि धारे का पानी बेहद शुद्ध है। पेड़ों की जड़ों और चट्टानों से रिसकर आने वाले इस धारे के पानी की खासियत यह है कि वह कई महीने तक खराब नहीं होता। पानी की इसी शुद्धता को देखते हुए लोग इसे पीने के लिए ले जाते हैं। जब तक धारे की मरम्मत नहीं हुई थी, तब तक इसमें पानी की मात्रा ठीक ठाक थी। जब मरम्मत के नाम पर सीमेंट लगाया गया तो करीब 40 फीसदी पानी गायब हो गया। यह धारे से बहने के बजाए दूसरी तरफ से बर्बाद होता रहता है। लोगों का कहना है कि पहाड़ के प्राकृतिक धारों और नौलों के साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए।
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इससे धारों का जलस्तर कम हो जाता है। यदि कुछ काम करना हो तो धारे के पास जमीन पर फर्श डाल दिया जाए और बेकार बहने वाले पानी के संरक्षण के लिए टंकी बनाई जाए। धारों और नौलों के जीर्णोद्धार में आधुनिक तकनीक का प्रयोग कतई नहीं होना चाहिए। 
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बिना जानकारी के छेड़छाड़ न हो
थल निवासी शांति देवी का कहना है कि प्राकृतिक जलस्रोतों में मरम्मत के नाम पर छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। अक्सर यह देखा गया है कि जिन स्रोतों की मरम्मत की गई उनका पानी कम हो गया। उन्होंने कहा कि जलस्रोतों को प्राकृतिक तौर पर बहने देना चाहिए। मरम्मत और जीर्णोद्धार न किया जाए। 


स्रोतों का संरक्षण किया जाए
थल निवासी मीना मेहता का कहना है कि प्राकृतिक स्रोतों का पानी कम होना चिंता का विषय है। इसके असली कारणों की खोज जरूरी है। यदि इसी तरह स्रोत संकट में आते रहे तो आने वाले समय में लोगों को ठंडा पानी नसीब नहीं हो पाएगा। उन्होंने स्रोतों के संरक्षण की योजना बनाने की जरूरत बताई।

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