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किसान महासभा की जनयात्रा शुरू
Pithoragarh
Updated Mon, 22 Oct 2012 12:00 PM IST
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पिथौरागढ़। अखिल भारतीय किसान महासभा की धारचूला इकाई के बैनर तले अस्कोट अभ्यारण्य के कानून को काले कानून की संज्ञा देते हुए इससे मुक्ति और यारसा गंबू के दोहन के लिए व्यापार नीति बनाने के मुद्दे पर जनता को लामबंद करने के लिए चीन सीमा से सटे सिर्दांग से 65 किमी लंबी जनयात्रा शुरू हो गई है। यात्रा के दौरान गांवों में इन दोनों मुद्दों के समर्थन में रैलियां निकाली जाएंगी।
भाकपा माले के जिला सचिव जगत मर्तोलिया ने रविवार की सुबह 9 बजे सिर्दांग के पंचायत घर से जनयात्रा को रवाना किया। रैली को रवाना करने से पूर्व सभा को संबोधित करते हुए मर्तोलिया ने कहा कि अभ्यारण्य के दायरे में गावों को भी शामिल कर दिए जाने से दो-दो अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटे इलाके में सड़कों का निर्माण नहीं हो पा रहा है। सीमांत इलाके से लगातार पलायन हो रहा है। पलायन से सीमा की सुुरक्षा को गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाएगा। इसकी चिंता केंद्र, राज्य सरकार के साथ ही चुने हुए जनप्रतिनिधियों को नहीं है। 1984 में अस्कोट अभ्यारण्य बनने के बाद चीन और नेपाल की सीमा से सटे इलाके का विकास ठहर गया है। सरकारें राष्ट्रीय चिंता के इस विषय पर मौन हैं।
उन्होंने कहा यारसा गंबू से सीमांत में रहने वाले लोगों को सीजनल रोजगार दिया जा सकता है लेकिन राज्य सरकार इस दिशा में कदम नहीं उठा रही है। वन पंचायतों को दोहन का अधिकार देने की बात की जाती है लेकिन सीमांत के लोग यारसा गंबू को बाहर बेचने ले जाते हैं तो उसे पकड़ लिया जाता है। इसलिए यारसा गंबू दोहन की सरल नीति बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि 65 किमी यात्रा के दौरान 17 गांवों में संपर्क किया जाएगा। सभा को ग्राम प्रधान विमला थापा, संगठन के ब्लाक सचिव जीवन सिंह बिष्ट, हरीश वर्मा, अमर सिंह, पुष्कर सिंह, जयराम सरदार, संजय घुनियाल, जनक सिंह, राधा गर्खाल, पुष्पा आगरी, इंदिरा नेगी, सोना बिष्ट ने संबोधित किया।
भाकपा माले के जिला सचिव जगत मर्तोलिया ने रविवार की सुबह 9 बजे सिर्दांग के पंचायत घर से जनयात्रा को रवाना किया। रैली को रवाना करने से पूर्व सभा को संबोधित करते हुए मर्तोलिया ने कहा कि अभ्यारण्य के दायरे में गावों को भी शामिल कर दिए जाने से दो-दो अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटे इलाके में सड़कों का निर्माण नहीं हो पा रहा है। सीमांत इलाके से लगातार पलायन हो रहा है। पलायन से सीमा की सुुरक्षा को गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाएगा। इसकी चिंता केंद्र, राज्य सरकार के साथ ही चुने हुए जनप्रतिनिधियों को नहीं है। 1984 में अस्कोट अभ्यारण्य बनने के बाद चीन और नेपाल की सीमा से सटे इलाके का विकास ठहर गया है। सरकारें राष्ट्रीय चिंता के इस विषय पर मौन हैं।
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उन्होंने कहा यारसा गंबू से सीमांत में रहने वाले लोगों को सीजनल रोजगार दिया जा सकता है लेकिन राज्य सरकार इस दिशा में कदम नहीं उठा रही है। वन पंचायतों को दोहन का अधिकार देने की बात की जाती है लेकिन सीमांत के लोग यारसा गंबू को बाहर बेचने ले जाते हैं तो उसे पकड़ लिया जाता है। इसलिए यारसा गंबू दोहन की सरल नीति बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि 65 किमी यात्रा के दौरान 17 गांवों में संपर्क किया जाएगा। सभा को ग्राम प्रधान विमला थापा, संगठन के ब्लाक सचिव जीवन सिंह बिष्ट, हरीश वर्मा, अमर सिंह, पुष्कर सिंह, जयराम सरदार, संजय घुनियाल, जनक सिंह, राधा गर्खाल, पुष्पा आगरी, इंदिरा नेगी, सोना बिष्ट ने संबोधित किया।
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