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आरक्षण के बारे में कुछ नहीं जानती वनरावत जनजाति
Updated Fri, 03 Nov 2017 10:59 PM IST
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पिथौरागढ़। महाकाली से टौंस तक की यात्रा पर निकले डीएसबी कॉलेज नैनीताल के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. गिरधर सिंह नेगी ने जमतड़ी, गणागांव, किमखोला जाकर वनरावतों का हालचाल जाना। डॉ. नेगी ने बताया कि वनरावतों को आदम जनजाति का दर्जा मिला है, लेकिन यह जनजाति आरक्षण के बारे में कुछ नहीं जानते।
इसका मुख्य कारण अशिक्षा है। यदि वनरावत शिक्षित होते तो आरक्षण का लाभ लेने का प्रयास करते। उन्होंने आश्चर्य जताया कि वनरावतों के लिए कई सरकारी योजनाएं तो शुरू की गई, लेकिन उनका लाभ इस जनजाति को नहीं मिल पाया है। आज भी बेहद दीनहीन हालत में जीवन यापन कर रहे वनरावतों के लिए अभी बड़े स्तर पर काम करने की जरूरत है।
जौलजीबी में डॉ. नेगी ने समाजसेवी शकुंतला दताल से मुलाकात की। दारमा घाटी के दांतू गांव से आकर जौलजीबी में बसी शकुंतला ने सामाजिक क्षेत्र में काफी काम किया है। आज भी वह गरीबों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती हैं और उनकी समस्याओं को डीएम के सामने रखती हैं। डॉ. नेगी अपनी इस यात्रा के अगले चरण में बरम, बंगापानी, मदकोट होते हुए मुनस्यारी के लिए निकले हैं। वह मिलम तक जाएंगे।
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उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जनजीवन पर आ रहे बदलाव के साथ साथ वह प्राचीन इतिहास का भी अध्ययन करेंगे। उन्होंने बताया कि जनजातीय क्षेत्रों में यह उनकी दूसरी यात्रा है। इससे पहले 30 वर्ष पूर्व शोधकार्य के दौरान भी उन्होंने इस इलाके के गांवों का भ्रमण किया था।
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इसका मुख्य कारण अशिक्षा है। यदि वनरावत शिक्षित होते तो आरक्षण का लाभ लेने का प्रयास करते। उन्होंने आश्चर्य जताया कि वनरावतों के लिए कई सरकारी योजनाएं तो शुरू की गई, लेकिन उनका लाभ इस जनजाति को नहीं मिल पाया है। आज भी बेहद दीनहीन हालत में जीवन यापन कर रहे वनरावतों के लिए अभी बड़े स्तर पर काम करने की जरूरत है।
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जौलजीबी में डॉ. नेगी ने समाजसेवी शकुंतला दताल से मुलाकात की। दारमा घाटी के दांतू गांव से आकर जौलजीबी में बसी शकुंतला ने सामाजिक क्षेत्र में काफी काम किया है। आज भी वह गरीबों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती हैं और उनकी समस्याओं को डीएम के सामने रखती हैं। डॉ. नेगी अपनी इस यात्रा के अगले चरण में बरम, बंगापानी, मदकोट होते हुए मुनस्यारी के लिए निकले हैं। वह मिलम तक जाएंगे।
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उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जनजीवन पर आ रहे बदलाव के साथ साथ वह प्राचीन इतिहास का भी अध्ययन करेंगे। उन्होंने बताया कि जनजातीय क्षेत्रों में यह उनकी दूसरी यात्रा है। इससे पहले 30 वर्ष पूर्व शोधकार्य के दौरान भी उन्होंने इस इलाके के गांवों का भ्रमण किया था।