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‘लोक वाद्ययंत्रों के माध्यम से अपने को पहचानो’
Updated Wed, 14 Feb 2018 10:53 PM IST
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पिथौरागढ़। संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से अर्थ सोसायटी फॉर द वेलफेयर ऑफ मैनकाइंड संस्था ने यहां के स्कूलों में ‘लोक वाद्ययंत्रों के माध्यम से अपने को पहचानो’ अभियान शुरू कर दिया है। स्कूली बच्चों को पहाड़ पर प्रचलित लोक वाद्ययंत्र हुड़का, ढोल, दमुवा, नगाड़ा के बारे में जानकारी दी जा रही है। नई पीढ़ी के कई बच्चों ने तो इन वाद्ययंत्रों को देखा तक नहीं है।
बुधवार से इस अभियान की शुरुआत कर दी गई। सरस्वती शिशु मंदिर नया बाजार में बच्चों को हुड़का वाद्ययंत्र से परिचित कराया गया तो देवसिंह राजकीय इंटर कॉलेज में बच्चों को ढोल की जानकारी दी गई। इस दौरान कई बच्चों ने छपेली का गायन भी किया। अर्थ संस्था के महासचिव मनोज लीला भट्ट ने बताया कि हुड़का, ढोल, दमुवा को तैयार करने वाली पीढ़ी अब समाप्ति की ओर है।
नई पीढ़ी इस कौशल को नहीं जानती। सबसे दुखद पहलू यह है कि इस विधा को अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित करने की कोई ठोस पहल नहीं हुई। यही वजह है कि कई पुराने वादकों के साथ यह कला भी समाप्त हो गई। वह कहते हैं कि हालांकि आज भी कुछ बारातों और मंदिर में लगने वाले जागर में हुड़का, ढोल का जरूर प्रयोग होता है, लेकिन चिंता इस बात की है कि यह परंपरा कब तक जीवित रहेगी।
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उन्होंने कहा कि यदि नई पीढ़ी को वाद्य यंत्रों से परिचित करा दिया जाए तो हो सकता है कि उनकी रुचि इस ओर बढ़ने लग जाए। विद्यालयों में यह कार्यक्रम चलाने के लिए सभी वाद्ययंत्र संस्था ने खुद ही जुटाए हैं। मनोज ने बताया कि नगर क्षेत्र के विद्यालयों में यह कार्यक्रम चलाने के बाद ग्रामीण अंचलों के विद्यार्थियों के बीच भी इसी तरह का अभियान चलेगा।
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बुधवार से इस अभियान की शुरुआत कर दी गई। सरस्वती शिशु मंदिर नया बाजार में बच्चों को हुड़का वाद्ययंत्र से परिचित कराया गया तो देवसिंह राजकीय इंटर कॉलेज में बच्चों को ढोल की जानकारी दी गई। इस दौरान कई बच्चों ने छपेली का गायन भी किया। अर्थ संस्था के महासचिव मनोज लीला भट्ट ने बताया कि हुड़का, ढोल, दमुवा को तैयार करने वाली पीढ़ी अब समाप्ति की ओर है।
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नई पीढ़ी इस कौशल को नहीं जानती। सबसे दुखद पहलू यह है कि इस विधा को अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित करने की कोई ठोस पहल नहीं हुई। यही वजह है कि कई पुराने वादकों के साथ यह कला भी समाप्त हो गई। वह कहते हैं कि हालांकि आज भी कुछ बारातों और मंदिर में लगने वाले जागर में हुड़का, ढोल का जरूर प्रयोग होता है, लेकिन चिंता इस बात की है कि यह परंपरा कब तक जीवित रहेगी।
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उन्होंने कहा कि यदि नई पीढ़ी को वाद्य यंत्रों से परिचित करा दिया जाए तो हो सकता है कि उनकी रुचि इस ओर बढ़ने लग जाए। विद्यालयों में यह कार्यक्रम चलाने के लिए सभी वाद्ययंत्र संस्था ने खुद ही जुटाए हैं। मनोज ने बताया कि नगर क्षेत्र के विद्यालयों में यह कार्यक्रम चलाने के बाद ग्रामीण अंचलों के विद्यार्थियों के बीच भी इसी तरह का अभियान चलेगा।