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प्रदेश के सबसे संवेदनशील जिले में आपदा प्रबंधन का पद खाली
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पिथौरागढ़। मानसून की दस्तक के बाद भी प्रदेश के सबसे संवेदनशील पिथौरागढ़ जिले में आपदा प्रबंधन अधिकारी का पद खाली है।
पिथौरागढ़ जिला आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। इस जिले के 125 से अधिक गांव संवेदनशील हैं। यहां पर हर साल बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं होती हैं। वर्ष 1998 की मालपा की त्रासदी सबसे भयानक थी। इस हादसे में 60 कैलाश मानसरोवर यात्रियों सहित 207 लोगों की मौत हो गई थी। हादसे में मारे गए लोगों में से केवल सात के शव मिले थे। 2009 में जिले में बादल फटने की दो घटनाएं हुईं। ला झेकला में 47 लोग मारे गए जबकि इसकी वर्ष बरम में हुई बादल फटने की दूसरी घटना में 15 लोगों की मौत हो गई थी। वर्ष 2014 में धारचूला तहसील क्षेत्र में हुई बादल फटने की घटना में 11 लोग और 2015 में 17 लोग असमय काल के गाल में समा गए थे।
आपदा के कहर का यह सिलसिला 2016 में भी नहीं थमा। पहली जुलाई को बादल फटने से डीडीहाट तहसील के बस्तड़ी गांव में 21 लोगों की मौत हो गई थी। 14 अगस्त 2017 को भारत-चीन सीमा से लगे दुंगदुंग और मालपा में बादल फटने से छह सेना के जवानों के साथ ही 25 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। 1998 के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग में बादल फटने की यह दूसरी भयावह घटना थी। पिछले साल 2018 में भी मुनस्यारी, बंगापानी और धारचूला में बादल फटने की घटनाएं हुईं। धारचूला में नाला ऊफान पर आने से एक ही परिवार के तीन सदस्यों की मौत हो गई थी। जिले में पिछले दो दशकों में आपदा से मरने वालों का आंकड़ा एक हजार के पार हो चुका है।
जिले में आपदा प्रबंधन अधिकारी पद पर शीघ्र नियुक्ति के लिए प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है। शीघ्र आपदा प्रबंधन अधिकारी के पद पर तैनाती होने की उम्मीद है।
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-डॉ.विजय कुमार जोगदंडे जिलाधिकारी पिथौरागढ़।
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पिथौरागढ़ जिला आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। इस जिले के 125 से अधिक गांव संवेदनशील हैं। यहां पर हर साल बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं होती हैं। वर्ष 1998 की मालपा की त्रासदी सबसे भयानक थी। इस हादसे में 60 कैलाश मानसरोवर यात्रियों सहित 207 लोगों की मौत हो गई थी। हादसे में मारे गए लोगों में से केवल सात के शव मिले थे। 2009 में जिले में बादल फटने की दो घटनाएं हुईं। ला झेकला में 47 लोग मारे गए जबकि इसकी वर्ष बरम में हुई बादल फटने की दूसरी घटना में 15 लोगों की मौत हो गई थी। वर्ष 2014 में धारचूला तहसील क्षेत्र में हुई बादल फटने की घटना में 11 लोग और 2015 में 17 लोग असमय काल के गाल में समा गए थे।
आपदा के कहर का यह सिलसिला 2016 में भी नहीं थमा। पहली जुलाई को बादल फटने से डीडीहाट तहसील के बस्तड़ी गांव में 21 लोगों की मौत हो गई थी। 14 अगस्त 2017 को भारत-चीन सीमा से लगे दुंगदुंग और मालपा में बादल फटने से छह सेना के जवानों के साथ ही 25 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। 1998 के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग में बादल फटने की यह दूसरी भयावह घटना थी। पिछले साल 2018 में भी मुनस्यारी, बंगापानी और धारचूला में बादल फटने की घटनाएं हुईं। धारचूला में नाला ऊफान पर आने से एक ही परिवार के तीन सदस्यों की मौत हो गई थी। जिले में पिछले दो दशकों में आपदा से मरने वालों का आंकड़ा एक हजार के पार हो चुका है।
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जिले में आपदा प्रबंधन अधिकारी पद पर शीघ्र नियुक्ति के लिए प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है। शीघ्र आपदा प्रबंधन अधिकारी के पद पर तैनाती होने की उम्मीद है।
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-डॉ.विजय कुमार जोगदंडे जिलाधिकारी पिथौरागढ़।