फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Pithoragarh News ›   144 years ago Paul was founded by Paul King Pushkar Fair Foundation Jauljibi

144 साल पहले पाल राजा पुष्कर पाल ने डाली थी जौलजीबी मेले की नींव

Thu, 12 Nov 2015 10:20 PM IST
केबी पाल/अमर उजाला, अस्कोट (पिथौरागढ़)
केबी पाल/अमर उजाला, अस्कोट (पिथौरागढ़) Updated Thu, 12 Nov 2015 10:20 PM IST
विज्ञापन
144 years ago Paul was founded by Paul King Pushkar Fair Foundation Jauljibi

भले ही आज जौलजीबी का ऐतिहासिक मेला व्यापारिक मेले के रूप में पहचान रखता हो, परंतु इस प्राचीन मेले की शुरुआत धार्मिक मेले के रूप में हुई थी। मेले की नींव 144 साल पहले जौलजीबी के ऐतिहासिक शिव मंदिर ज्वालेश्वर की स्थापना के समय अस्कोट रियासत के राजा पुष्कर पाल ने रखी थी।

विज्ञापन


एक बार हालात ऐसे पैदा हुए कि नौ साल तक पाल रियासत का शासन अंग्रेजों के हाथों में रहा, तब अंग्रेजों ने जौलजीबी मेले का संचालन किया था। वर्ष 1871 में राजा पुष्कर पाल ने जौलजीबी के महाकाली और गोरी नदी के संगम पर ज्वालेश्वर महादेश मंदिर स्थापित कराया।
विज्ञापन


मार्गशीर्ष संक्रांति को मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की गई, उसी दिन से जौलजीबी में मेले की शुरुआत हो गई। हर साल मार्गशीर्ष संक्रांति से जौलजीबी का मेला लगने लगा। धीरे-धीरे मेले ने व्यापारिक मेले का रूप ले लिया। तिब्बत से व्यापारी दुकान लगाने आने लगे।
विज्ञापन
विज्ञापन


तिब्बती व्यापारियों का जौलजीबी मेले में बेरोकटोक आना-जाना वर्ष 1962 की लड़ाई से पहले तक जारी रहा, इस लड़ाई के बाद तिब्बती व्यापारियों का मेले में आना बंद हो गया, लेकिन ट्रेड व्यापार के जरिए भारतीय व्यापारी आज भी तिब्बती सामान लेकर जौलजीबी मेले में पहुंचाते हैं।

बुजुर्ग बताते हैं कि प्राचीन समय में देशभर से व्यापारी जौलजीबी मेले में आते थे। नेपाल के हुमला, जुमला के घोड़ों की मेले में खास डिमांड रहती थी, जो आज भी रहती है। यूपी के शहरों से घोड़े खरीदने लोग जौलजीबी पहुंचते हैं। राजा पुष्कर पाल के बाद राजा गजेंद्र पाल, राजा विक्रम बहादुर पाल ने मेले का बखूबी संचालन किया।

वर्ष 1938 में राजा विक्रम बहादुर पाल की मृत्यु हो गई। तब युवराज टिकेंद्र बहादुर पाल नाबालिग थे। युवराज के नाबालिग होने के चलते वर्ष 1947 तक अस्कोट रियासत का संचालन अंग्रेजों ने किया। इन नौ सालों में अंग्रेजों ने जौलजीबी मेले की व्यवस्थाओं को भी बखूबी अंजाम दिया।

1947 से 52 तक अस्कोट रियासत का संचालन भारत सरकार ने किया। वर्ष 1953 में युवराज के टिकेंद्र के बालिग होने पर उन्हें राजगद्दी सौंपी गई। 11 नवंबर 1967 को टिकेंद्र के राजा रहते रियासत का भारत में विलय हो गया। वर्ष 1975 से जौलजीबी मेले को सरकारी मेला घोषित किया गया, मेला देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर से मनाया जाने लगा।

अब सरकारी मेला एक सप्ताह तक चलता है। व्यापारिक गतिविधियां 10 दिनों तक चलती हैं। प्राचीन समय में जौलजीबी मेले में नेपाल से घी और अल्मोड़ा के जोगा लाल साह की मिठाई की खूब डिमांड रहती थी।

बुजुर्ग बताते हैं कि मथुरा, अल्मोड़ा, चंपावत से पीतल, कांसे, तांबे के बर्तन बेचने व्यापारी मेले में आते थे, जो बर्तन नहीं बिक पाते थे, उन्हें राजा खरीद लेते थे। इस प्रकार व्यापारियों का पूरा माल बिक जाता था। तब पाल राजा नेपाल को जोड़ने के लिए नदी में अस्थायी पुल का निर्माण कराते थे।

बगड़ीहाट निवासी 80 वर्षीय पूर्व सैनिक कृष्ण बहादुर पाल बताते हैं कि पहले जौलजीबी मेले में सेना की भर्ती होती थी। वह स्वयं वर्ष 1955 में जौलजीबी के मेले से सेना में भर्ती हुए थे। वर्ष 1957 तक जोग्यूड़ा के व्यापौ सेना मैदान में भर्ती मेला लगता था।


14 नवंबर से प्रारंभ हो रहे जौलजीबी मेले में शासन के मेहमान रूप में पाल राजवंश के वारिस रजवार भानुराज पाल मौजूद रहेंगे। रजवार भानुराज ने कहा कि उनके पूर्वजों द्वारा प्रारंभ किए गए मेले का संचालन होता देख खुशी होती है। कहते हैं कि इस ऐतिहासिक मेले को और सुविधाजनक बनाने की आवश्यकता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed