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शिक्षकों की भूमिका विषय पर दो दिवसीय संगोष्ठी शुरू
Updated Sun, 29 Oct 2017 10:31 PM IST
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पिथौरागढ़। अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की ओर से ‘शिक्षा के बदलते प्रतिमान और शिक्षक की भूमिका’ विषय पर आयोजित दो दिनी राज्यस्तरीय शिक्षक संगोष्ठी शुरू हो गई है। संगोष्ठी में राज्य से विभिन्न जिलों के 45 शिक्षक भाग ले रहे हैं। संगोष्ठी में शिक्षकों ने विभिन्न विषयों पर अपने आलेख प्रस्तुत किए।
संगोष्ठी का शुभारंभ फाउंडेशन के लोकेश ठाकुर ने किया। उन्होंने बताया कि आलेख को पांच वर्गों में शिक्षा के उद्देश्य, बचपन, शिक्षा और समुदाय, कक्षा शिक्षण में नवाचार, शिक्षक-शिक्षा आदि वर्गों में लिखे गए हैं जो शिक्षकों के धरातलीय अनुभवों पर आधारित हैं। बताया कि अल्मोड़ा जिले से पांच, बागेश्वर से दो, पिथौरागढ़ से 22, टिहरी से चार, पौड़ी से दो, उत्तरकाशी से दो, देहरादून से एक, नैनीताल से दो, ऊधमसिंह नगर से दो, चंपावत से दो और छत्तीसगढ़ से एक आलेख प्रस्तुत किया गया है। कहा कि आज शिक्षकों की भूमिका बदल रही है और शिक्षकों को भी इस स्थिति में अपने को समय की जरूरतों के साथ बदलना होगा।
संगोष्ठी में बताया गया कि शिक्षकों के सीखने का रास्ता बातचीत, सवाल करने, समूह में बात करने, उस पर पढ़ना-लिखना, चर्चा करना आदि चरणों से होकर गुजरता है। इस प्रक्रिया से गुजरने पर ही शिक्षक की समझ ज्यादा मजबूत होगी, जिसका फायदा विद्यालयों में बच्चों को मिलेगा। सोमवार को आयोजित संगोष्ठी में शिक्षा में समुदाय की भूमिका, शिक्षा के उद्देश्य, और शिक्षक शिक्षा विषय पर आलेख पड़े जाएंगे। संगोष्ठी में केेएन कांडपाल, गंगा आर्य, चिंतामणि जोशी, भावना जोशी, शिखा गंगवार, रेखा बोरा, रमेश जोशी ने विचार रखे।
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संगोष्ठी का शुभारंभ फाउंडेशन के लोकेश ठाकुर ने किया। उन्होंने बताया कि आलेख को पांच वर्गों में शिक्षा के उद्देश्य, बचपन, शिक्षा और समुदाय, कक्षा शिक्षण में नवाचार, शिक्षक-शिक्षा आदि वर्गों में लिखे गए हैं जो शिक्षकों के धरातलीय अनुभवों पर आधारित हैं। बताया कि अल्मोड़ा जिले से पांच, बागेश्वर से दो, पिथौरागढ़ से 22, टिहरी से चार, पौड़ी से दो, उत्तरकाशी से दो, देहरादून से एक, नैनीताल से दो, ऊधमसिंह नगर से दो, चंपावत से दो और छत्तीसगढ़ से एक आलेख प्रस्तुत किया गया है। कहा कि आज शिक्षकों की भूमिका बदल रही है और शिक्षकों को भी इस स्थिति में अपने को समय की जरूरतों के साथ बदलना होगा।
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संगोष्ठी में बताया गया कि शिक्षकों के सीखने का रास्ता बातचीत, सवाल करने, समूह में बात करने, उस पर पढ़ना-लिखना, चर्चा करना आदि चरणों से होकर गुजरता है। इस प्रक्रिया से गुजरने पर ही शिक्षक की समझ ज्यादा मजबूत होगी, जिसका फायदा विद्यालयों में बच्चों को मिलेगा। सोमवार को आयोजित संगोष्ठी में शिक्षा में समुदाय की भूमिका, शिक्षा के उद्देश्य, और शिक्षक शिक्षा विषय पर आलेख पड़े जाएंगे। संगोष्ठी में केेएन कांडपाल, गंगा आर्य, चिंतामणि जोशी, भावना जोशी, शिखा गंगवार, रेखा बोरा, रमेश जोशी ने विचार रखे।
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