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675 साल में एक किमी पीछे खिसका पिंडारी ग्लेशियर
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पिथौरागढ़। कुमाऊं विश्वविद्यालय ने नेशनल मिशन ऑफ हिमालयन स्टडीज और पंडित गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान कोसी कटारमल ने लाइकेन अभिज्ञान एवं संरक्षण कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला में लाइकेन को जीवन का आधार बताया गया। कहा गया कि 675 वर्ष में पिंडारी ग्लेशियर एक किमी पीछे खिसक गया है। इसे लाइकेन से इंगित किया गया है।
मुख्य अतिथि फैलो ऑफ नेशनल एकेडमी प्रोफेसर डीके उप्रेती ने लाइकेन को जीवन का आधार बताते हुए कहा कि हिंदुस्तान में 2712 लाइकेन की प्रजातियां हैं, जिसमें से 500 प्रजातियां औषधीय रूप से महत्वपूर्ण हैं। विश्व में 20,000 लाइकेन की प्रजातियां ज्ञात हैं। लाइकेन शैवाल और कवक का सह जीवन है, जो विभिन्न प्रकार के आवासों में पाए जाते हैं। उन्होंने कहा हैदराबाद की बिरयानी का राज पारमेलिया लाइकेन है। गरम मसाले भी लाइकेन से ही सुगंधित होते हैं। कहा लाइकेन प्रदूषण की निगरानी करते हैं।
लाइकेन डाई, रंग और पर्यावरण संरक्षण सूचक है। बताया कि लाइकेन के तहत मिलने वाला अस्नीया कैंसर रोधी है। हिना इतरा भी लाइकेन से मिलता है। मॉस इवेनिया 10 लाख रुपये प्रति लीटर बिकता है। क्लेडोनिया फेफड़ों की बीमारी में काम आता है। बताया कि लाइकेन से जलवायु परिवर्तन की भी पहचान की जाती है।
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आयोजक सचिव डॉ. संतोष उपाध्याय ने कार्यशाला की रूपरेखा सामने रखी। भेषज संघ के सचिव आरएस धौनी ने आर्थिकी, लाइकेन और विपणन पर चर्चा की। डाइबर के डॉ. एचके पांडे ने औषधीय पौधों पर प्रकाश डाला। अंकिता त्रिपाठी ने लाइकेन ग्राफसीट की जानकारी दी। प्रो.ललित तिवारी के संचालन में हुई कार्यशाला में प्रोफेसर डीके उप्रेती, डॉ. एचके पांडे, भगवान पंत, आरएस धौनी को शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। इस दौरान क्विज प्रतियोगिता भी कराई गई।
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मुख्य अतिथि फैलो ऑफ नेशनल एकेडमी प्रोफेसर डीके उप्रेती ने लाइकेन को जीवन का आधार बताते हुए कहा कि हिंदुस्तान में 2712 लाइकेन की प्रजातियां हैं, जिसमें से 500 प्रजातियां औषधीय रूप से महत्वपूर्ण हैं। विश्व में 20,000 लाइकेन की प्रजातियां ज्ञात हैं। लाइकेन शैवाल और कवक का सह जीवन है, जो विभिन्न प्रकार के आवासों में पाए जाते हैं। उन्होंने कहा हैदराबाद की बिरयानी का राज पारमेलिया लाइकेन है। गरम मसाले भी लाइकेन से ही सुगंधित होते हैं। कहा लाइकेन प्रदूषण की निगरानी करते हैं।
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लाइकेन डाई, रंग और पर्यावरण संरक्षण सूचक है। बताया कि लाइकेन के तहत मिलने वाला अस्नीया कैंसर रोधी है। हिना इतरा भी लाइकेन से मिलता है। मॉस इवेनिया 10 लाख रुपये प्रति लीटर बिकता है। क्लेडोनिया फेफड़ों की बीमारी में काम आता है। बताया कि लाइकेन से जलवायु परिवर्तन की भी पहचान की जाती है।
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आयोजक सचिव डॉ. संतोष उपाध्याय ने कार्यशाला की रूपरेखा सामने रखी। भेषज संघ के सचिव आरएस धौनी ने आर्थिकी, लाइकेन और विपणन पर चर्चा की। डाइबर के डॉ. एचके पांडे ने औषधीय पौधों पर प्रकाश डाला। अंकिता त्रिपाठी ने लाइकेन ग्राफसीट की जानकारी दी। प्रो.ललित तिवारी के संचालन में हुई कार्यशाला में प्रोफेसर डीके उप्रेती, डॉ. एचके पांडे, भगवान पंत, आरएस धौनी को शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। इस दौरान क्विज प्रतियोगिता भी कराई गई।