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सीमांत के गांवों में आज भी रहता है चिट्ठी का इंतजार
Updated Mon, 08 Oct 2018 10:45 PM IST
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पिथौरागढ़। आज दुनिया भले ही डिजिटल हो गई हो, लेकिन पिथौरागढ़ जिले में कई गांव ऐसे हैं जहां के लोगों को आज भी चिट्ठी का इंतजार रहता है।
मुनस्यारी और धारचूला के दर्जनों गांवों में आज भी चिट्ठी-पत्री से ही अपनों की कुशल क्षेम पूछी जाती है।
संचार सुविधा से जुड़े गांवों और शहरों के लोग वीडियो कॉल से सैकड़ों मील दूर बैठे परिजनों से बातचीत कर रहे हैं दूसरी ओर मुनस्यारी का नामिक गांव ऐसा है जहां के ग्रामीण इस डिजिटल क्रांति को नहीं पहचानते हैं।
आज भी यहां के लोगों को नौकरी की तलाश में बाहर गए लोगों का हालचाल चिट्ठी से ही पता चलता है। या फिर लोगों को मीलों दूर आकर बातचीत करनी पड़ती है। लगभग सात सौ की जनसंख्या वाले नामिक गांव की ग्राम प्रधान तुलसी जेम्याल और बहादुर सिंह बताते हैं कि आज भी उनके लिए संचार का माध्यम डाक विभाग ही है। जो भी लोग गांव से बाहर रहते हैं महीनों में उनकी कुशल क्षेम मिलती है।
कुछ यही हाल धारचूला के दूरस्थ रांथी और इसके आसपास के गांवों का भी है। यहां अभी तक संचार क्रांति नहीं पहुंची है। इस क्षेत्र के लोग भी अपनों का हाल जानने के लिए चिट्ठी पर ही निर्भर हैं।
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मुनस्यारी और धारचूला के दर्जनों गांवों में आज भी चिट्ठी-पत्री से ही अपनों की कुशल क्षेम पूछी जाती है।
संचार सुविधा से जुड़े गांवों और शहरों के लोग वीडियो कॉल से सैकड़ों मील दूर बैठे परिजनों से बातचीत कर रहे हैं दूसरी ओर मुनस्यारी का नामिक गांव ऐसा है जहां के ग्रामीण इस डिजिटल क्रांति को नहीं पहचानते हैं।
आज भी यहां के लोगों को नौकरी की तलाश में बाहर गए लोगों का हालचाल चिट्ठी से ही पता चलता है। या फिर लोगों को मीलों दूर आकर बातचीत करनी पड़ती है। लगभग सात सौ की जनसंख्या वाले नामिक गांव की ग्राम प्रधान तुलसी जेम्याल और बहादुर सिंह बताते हैं कि आज भी उनके लिए संचार का माध्यम डाक विभाग ही है। जो भी लोग गांव से बाहर रहते हैं महीनों में उनकी कुशल क्षेम मिलती है।
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कुछ यही हाल धारचूला के दूरस्थ रांथी और इसके आसपास के गांवों का भी है। यहां अभी तक संचार क्रांति नहीं पहुंची है। इस क्षेत्र के लोग भी अपनों का हाल जानने के लिए चिट्ठी पर ही निर्भर हैं।
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