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प्राकृतिक स्रोतों को सहेजा जाए तो नहीं रहेगा पेयजल संकट
Updated Thu, 07 Jun 2018 11:16 PM IST
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पिथौरागढ़। सोरघाटी और आसपास के गांवों में पेयजल संकट हमेशा रहता है। इस संकट को दूर करने के लिए घाट, आंवलाघाट जैसी बड़ी पंपिंग पेयजल योजनाएं बनाई गई हैं, लेकिन इनसे भी नगर की जनता की प्यास नहीं बुझ रही है। नलों में दूषित पानी आने से लोग परेशान हैं। यदि पूर्व में ही नौलों, धारों का संरक्षण किया गया होता तो आज सोरघाटी में पानी का संकट नहीं होता।
पिथौरागढ़ के लोगों की प्यास बुझाने के लिए 1979 में घाट पंपिंग पेयजल योजना बनाई गई। इससे पूर्व 1975 में रई पंपिंग योजना से पानी की आपूर्ति की जाती थी। उस समय नगर और आसपास कई नौले थे। बाद में आबादी बढ़ने और नगर का विस्तार होने से पानी की कमी भी बढ़ने लगी। 1985 में भैलोत ग्रेविटी योजना बनी। इन तीनों योजनाओं से 3.60 एमएलडी पानी मिलता था।
नगर की आबादी बढ़ने और पानी का संकट गहराने के बाद नई योजना 2001 में ठुलीगाड़ से बनाई गई। इस योजना से तीन एमएलडी पानी नगर को मिलने लगा। नगर एवं आसपास के गांवों की करीब 80 हजार की आबादी के लिए प्रतिदिन 12.42 एमएलडी पानी की आवश्यकता है। इन चारों योजनाओं से सामान्य दिनों में 6.60 और गर्मियों में 6.50 एमएलडी पानी मिल पाता है।
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जल संस्थान के अधिशासी अधिकारी विशाल कुमार का कहना है कि उक्त योजनाओं में .10 एमएलडी पानी की कमी है। वर्तमान में नगर की आबादी एक लाख पहुंच गई है। पानी की गंभीर किल्लत को देखते हुए 75 करोड़ की लागत से आंवलाघाट पंपिंग योजना अस्तित्व में आई। इस योजना से छह एमएलडी पानी मिलने का दावा किया गया है। बावजूद इसके पेयजल संकट बना है।
आंवलाघाट का पानी जब से नगर में बंट रहा है तब से ही यह दूषित तो है ही साथ ही इसमें कीड़े निकलने की भी शिकायतें आ रही हैं। लोग पीने के पानी के लिए महादेव, गुरना, हुड़कन्ना धारों पर निर्भर हैं। कभी सोरघाटी के आसपास 25 से अधिक पानी के स्रोत थे, जिनमें कई तो अब बंद हो गए है और कुछ में पानी काफी कम हो गया है। वरिष्ठ पत्रकार बीडी कसनियाल कहते हैं कि कैचमेंट क्षेत्र में पौधरोपण कर पेयजल स्रोतों को बचाया जा सकता है।
जल संरक्षण और संवर्द्धन के लिए प्रदेश सरकार काम कर रही है। पुराने चाल-खाल और नौले धारों का संरक्षण किया जाएगा। -प्रकाश पंत, पेयजल मंत्री
पपदेऊ के सात नौले बंद
पिथौरागढ़। जिला मुख्यालय से लगे पपदेऊ गांव में कभी सात नौले थे। इसका पानी पीने के साथ ही अन्य कार्यों में भी लिया जाता था। पिछले 20 वर्षों से यह नौले मिट्टी, घास से बंद हो गए हैं। गांव में भैंसियापातल गधेरे से पानी आता है। इसे शिव मंदिर स्थित टैंक में स्टोर कर नलों के जरिये घरों में आपूर्ति की जाती है। गांव के युवा व्यापारी उमेश वर्मा का कहना है कि नौलों को कभी बचाने का प्रयास नहीं किया गया।
सब्जी उत्पादन पर पड़ा असर
पिथौरागढ़। सब्जी उत्पादक गांव पुनेड़ी में कभी 10 नौले थे। पिछले 10 वर्षों तक ग्रामीण इनका पानी उपयोग में लाते थे। वर्तमान में अधिकतर नौलों में पानी बेहद कम रह गया है। इसका असर सब्जी उत्पादन पर पड़ा। क्षेत्र के बीडीसी मेंबर देवेंद्र सिंह रावत कहते हैं नौलों के पुनर्जीवन के प्रयास नहीं हुए, इसके चलते पानी की कमी हो गई।
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पिथौरागढ़ के लोगों की प्यास बुझाने के लिए 1979 में घाट पंपिंग पेयजल योजना बनाई गई। इससे पूर्व 1975 में रई पंपिंग योजना से पानी की आपूर्ति की जाती थी। उस समय नगर और आसपास कई नौले थे। बाद में आबादी बढ़ने और नगर का विस्तार होने से पानी की कमी भी बढ़ने लगी। 1985 में भैलोत ग्रेविटी योजना बनी। इन तीनों योजनाओं से 3.60 एमएलडी पानी मिलता था।
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नगर की आबादी बढ़ने और पानी का संकट गहराने के बाद नई योजना 2001 में ठुलीगाड़ से बनाई गई। इस योजना से तीन एमएलडी पानी नगर को मिलने लगा। नगर एवं आसपास के गांवों की करीब 80 हजार की आबादी के लिए प्रतिदिन 12.42 एमएलडी पानी की आवश्यकता है। इन चारों योजनाओं से सामान्य दिनों में 6.60 और गर्मियों में 6.50 एमएलडी पानी मिल पाता है।
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जल संस्थान के अधिशासी अधिकारी विशाल कुमार का कहना है कि उक्त योजनाओं में .10 एमएलडी पानी की कमी है। वर्तमान में नगर की आबादी एक लाख पहुंच गई है। पानी की गंभीर किल्लत को देखते हुए 75 करोड़ की लागत से आंवलाघाट पंपिंग योजना अस्तित्व में आई। इस योजना से छह एमएलडी पानी मिलने का दावा किया गया है। बावजूद इसके पेयजल संकट बना है।
आंवलाघाट का पानी जब से नगर में बंट रहा है तब से ही यह दूषित तो है ही साथ ही इसमें कीड़े निकलने की भी शिकायतें आ रही हैं। लोग पीने के पानी के लिए महादेव, गुरना, हुड़कन्ना धारों पर निर्भर हैं। कभी सोरघाटी के आसपास 25 से अधिक पानी के स्रोत थे, जिनमें कई तो अब बंद हो गए है और कुछ में पानी काफी कम हो गया है। वरिष्ठ पत्रकार बीडी कसनियाल कहते हैं कि कैचमेंट क्षेत्र में पौधरोपण कर पेयजल स्रोतों को बचाया जा सकता है।
जल संरक्षण और संवर्द्धन के लिए प्रदेश सरकार काम कर रही है। पुराने चाल-खाल और नौले धारों का संरक्षण किया जाएगा। -प्रकाश पंत, पेयजल मंत्री
पपदेऊ के सात नौले बंद
पिथौरागढ़। जिला मुख्यालय से लगे पपदेऊ गांव में कभी सात नौले थे। इसका पानी पीने के साथ ही अन्य कार्यों में भी लिया जाता था। पिछले 20 वर्षों से यह नौले मिट्टी, घास से बंद हो गए हैं। गांव में भैंसियापातल गधेरे से पानी आता है। इसे शिव मंदिर स्थित टैंक में स्टोर कर नलों के जरिये घरों में आपूर्ति की जाती है। गांव के युवा व्यापारी उमेश वर्मा का कहना है कि नौलों को कभी बचाने का प्रयास नहीं किया गया।
सब्जी उत्पादन पर पड़ा असर
पिथौरागढ़। सब्जी उत्पादक गांव पुनेड़ी में कभी 10 नौले थे। पिछले 10 वर्षों तक ग्रामीण इनका पानी उपयोग में लाते थे। वर्तमान में अधिकतर नौलों में पानी बेहद कम रह गया है। इसका असर सब्जी उत्पादन पर पड़ा। क्षेत्र के बीडीसी मेंबर देवेंद्र सिंह रावत कहते हैं नौलों के पुनर्जीवन के प्रयास नहीं हुए, इसके चलते पानी की कमी हो गई।