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मेरी आंखों से रोशन हो किसी की दुनियां, मेरे मरने के बाद भी धड़के मेरा दिल
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पिथौरागढ़। मेरी आंखों से किसी की अंधेरी दुनियां में उजाला हो, मेरे मरने के बाद भी मेरा दिल किसी और के शरीर में धड़के, शरीर का हर अंग किसी जरूरतमंद के जीवन में खुशियां लाए और बाकी शरीर मेडिकल कालेज के छात्रों के प्रयोग के काम आए। यह किसी कहानी की पंक्तियां नहीं बल्कि लोगों को नेत्र और अंगदान के लिए प्रेरित कर रहे एडवोकेट तारा सिंह की वसीयत के शब्द हैं।
मूल रूप से हरिनगर मेरठ निवासी एडवोकेट डॉ. तारा सिंह वर्तमान में पिथौरागढ़ में रहते हैं। डॉ.सिंह ने बताया कि जब वह वर्ष 1991 में देहरादून के राजपुर रोड पर स्थित दृष्टि बाधित संस्थान में एक बच्चे का दाखिला करने गए थे तब सीढ़ियों में बैठी नेत्रहीन 11-12 साल की बालिका को देखकर मन इतना द्रवित हुआ कि उन्होंने उसी समय नेत्रदान का संकल्प ले लिया। इसके बाद उन्होंने अंगदान और देहदान की वसीयत तैयार कर ली। इसके बाद उन्होंने पिथौरागढ़ के प्रसिद्ध समाजसेवी डॉ. गुरुकुलानंद सरस्वती कच्चाहारी की प्रेरणा से अन्य लोगों को भी अंगदान और देहदान के लिए प्रेरित करना शुरू किया।
उनकी प्रेरणा से आज दो दर्जन से अधिक लोग अंगदान और देहदान का संकल्प ले चुके हैं। डॉ.तारा सिंह कहते हैं कि जीवित व्यक्ति केवल गुर्दा, लीवर दूसरे व्यक्ति को दे सकता है, जबकि ब्रेन डेड व्यक्ति हृदय, हृदय के वाल्व, त्वचा, हड्डी और मध्य कान सहित शरीर के तमाम अंग दान कर सकता है। उनका कहना है कि सड़क दुर्घटना में प्रतिदिन चार सौ लोग अपना जीवन खो देते हैं। ऐसे अकाल मौत का शिकार होने वाले लोगों के अंगदान से औरों को जीवन देने वाला कानून बनना चाहिए। डॉ.सिंह कहते हैं कि लोगों को प्रेरित करने के लिए उनका अभियान जारी रहेगा।
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मूल रूप से हरिनगर मेरठ निवासी एडवोकेट डॉ. तारा सिंह वर्तमान में पिथौरागढ़ में रहते हैं। डॉ.सिंह ने बताया कि जब वह वर्ष 1991 में देहरादून के राजपुर रोड पर स्थित दृष्टि बाधित संस्थान में एक बच्चे का दाखिला करने गए थे तब सीढ़ियों में बैठी नेत्रहीन 11-12 साल की बालिका को देखकर मन इतना द्रवित हुआ कि उन्होंने उसी समय नेत्रदान का संकल्प ले लिया। इसके बाद उन्होंने अंगदान और देहदान की वसीयत तैयार कर ली। इसके बाद उन्होंने पिथौरागढ़ के प्रसिद्ध समाजसेवी डॉ. गुरुकुलानंद सरस्वती कच्चाहारी की प्रेरणा से अन्य लोगों को भी अंगदान और देहदान के लिए प्रेरित करना शुरू किया।
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उनकी प्रेरणा से आज दो दर्जन से अधिक लोग अंगदान और देहदान का संकल्प ले चुके हैं। डॉ.तारा सिंह कहते हैं कि जीवित व्यक्ति केवल गुर्दा, लीवर दूसरे व्यक्ति को दे सकता है, जबकि ब्रेन डेड व्यक्ति हृदय, हृदय के वाल्व, त्वचा, हड्डी और मध्य कान सहित शरीर के तमाम अंग दान कर सकता है। उनका कहना है कि सड़क दुर्घटना में प्रतिदिन चार सौ लोग अपना जीवन खो देते हैं। ऐसे अकाल मौत का शिकार होने वाले लोगों के अंगदान से औरों को जीवन देने वाला कानून बनना चाहिए। डॉ.सिंह कहते हैं कि लोगों को प्रेरित करने के लिए उनका अभियान जारी रहेगा।
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