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सुरों की रोशनी से हारा ‘अंधेरा’
Pauri
Updated Mon, 20 Oct 2014 05:32 AM IST
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कोटद्वार। मेरा डांडी कांठ्यूं का मुलुक ऐलू... और चम चमकी घाम डांड्यूं मा... जैसे प्रख्यात लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के गीत जब निर्मल की आवाज में गूंजते हैं तो सुनने वाले हर पंक्ति के साथ पहाड़ के नजारों की तस्वीरें जेहन में उभरती महसूस करने लगते हैं। पतली पगडंडियों पर चमकती पीली धूप, बुग्यालों की नर्म हरी घास और गंगा का नीला पानी एक-एक कर आंखों में उतरते जाते हैं। लेकिन अपने सुरों से श्रोताओं को पहाड़ की खूबसूरती से रूबरू कराने वाले निर्मल ने खुद कभी इन नजारों को नहीं देखा है। जन्म से ही दृष्टिहीन इस उभरते युवा गायक को तो यह भी मालूम नहीं कि जिन कुदरती नजारों का जिक्र वह अपने गीतों में करता है, उनका आकार, रंग-रूप कैसा है। लेकिन, इस कमी को उसने कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया। आंखों में अंधेरा था तो निर्मल ने सुरों को रोशनी बना लिया। थाली बजाकर गाने की शुरुआत की और अब अंधेरा उसके हौसले से हारने लगा है। दृष्टिहीन उसके छोटे भाई-बहन ने भी निर्मल की राह थामी और आज ये तीनों भाई-बहन जयहरीखाल क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं।
कोटलमंडा गांव में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले उमेद सिंह और राजेश्वरी के घर तीन बच्चों का जन्म हुआ। ईश्वर की लीला देखिए एक के बाद एक तीनों की जन्म से आंखों की रोशनी नहीं। सबसे बड़ा बेटा निर्मल में बचपन से ही गांव में दूसरों के घर पर बजने वाले रेडियो और टेपरिकार्डर के पास बैठ जाता है गढ़वाली गीत सुनता। इसके बाद उसने घर पर थाली बजाकर खुद लोक गीत गाने का अभ्यास शुरू किया। इस तरह से अपना टाइम पास और दूसरों का मनोरंजन करता। बड़े का भाई की देखादेखी कर मुकेश और छोटी बहन अंजलि ने भी गीत गाने शुरू कर दिए। कभी थाली बजाकर गीत गाने वाले निर्मल (25 ), मुकेश (20) और अंजलि (16) अब लोकगीतों के ऑडिशन शो में अपनी प्रस्तुति देने लगे हैं। रविवार को कोटद्वार में ऑडिशन में तीनों ने अपनी प्रस्तुति दी तो निर्णायक दंग रह गए और उन्हें फाइनल मुकाबले के चुन लिया।
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लोकगीतों को बनाया आर्थिकी का जरिया
तीनों भाई-बहनों ने अपने परिजनों पर बोझ बनने की अपेक्षा, अपने गायन को ही अपनी जीविका बनाने की ठानी। आज वे विभिन्न संस्थाओं के बुलावे पर लोकगीतों की प्रस्तुति देते हैं। जितना मेहनताना मिलता है उसी से घर का खर्चा चलाते हैं।
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विकलांगों को आत्मनिर्भर बनाने का सपना
निर्मल ने बताया कि उनका सपना गढ़वाली लोकगायकी के क्षेत्र में नाम कमाकर विकलांग बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का है। वह विकलांग बच्चों को लोक गीत सिखाने का कार्य करना चाहते हैं, ताकि उन जैसे बच्चों को कोई बोझ न समझे।
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कोटलमंडा गांव में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले उमेद सिंह और राजेश्वरी के घर तीन बच्चों का जन्म हुआ। ईश्वर की लीला देखिए एक के बाद एक तीनों की जन्म से आंखों की रोशनी नहीं। सबसे बड़ा बेटा निर्मल में बचपन से ही गांव में दूसरों के घर पर बजने वाले रेडियो और टेपरिकार्डर के पास बैठ जाता है गढ़वाली गीत सुनता। इसके बाद उसने घर पर थाली बजाकर खुद लोक गीत गाने का अभ्यास शुरू किया। इस तरह से अपना टाइम पास और दूसरों का मनोरंजन करता। बड़े का भाई की देखादेखी कर मुकेश और छोटी बहन अंजलि ने भी गीत गाने शुरू कर दिए। कभी थाली बजाकर गीत गाने वाले निर्मल (25 ), मुकेश (20) और अंजलि (16) अब लोकगीतों के ऑडिशन शो में अपनी प्रस्तुति देने लगे हैं। रविवार को कोटद्वार में ऑडिशन में तीनों ने अपनी प्रस्तुति दी तो निर्णायक दंग रह गए और उन्हें फाइनल मुकाबले के चुन लिया।
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लोकगीतों को बनाया आर्थिकी का जरिया
तीनों भाई-बहनों ने अपने परिजनों पर बोझ बनने की अपेक्षा, अपने गायन को ही अपनी जीविका बनाने की ठानी। आज वे विभिन्न संस्थाओं के बुलावे पर लोकगीतों की प्रस्तुति देते हैं। जितना मेहनताना मिलता है उसी से घर का खर्चा चलाते हैं।
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विकलांगों को आत्मनिर्भर बनाने का सपना
निर्मल ने बताया कि उनका सपना गढ़वाली लोकगायकी के क्षेत्र में नाम कमाकर विकलांग बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का है। वह विकलांग बच्चों को लोक गीत सिखाने का कार्य करना चाहते हैं, ताकि उन जैसे बच्चों को कोई बोझ न समझे।