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शिला रूप में सीता पूजन के साथ हुआ मनसार का मेला
Updated Wed, 01 Nov 2017 10:38 PM IST
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पौड़ी। सीता माता के प्रति असीम आस्था और भावनाओं से परिपूर्ण मनसार का पौराणिक मेला बुधवार को फलस्वाड़ी गांव के मैदान में हुआ। परंपरा व रीति-रिवाज के अनुरूप एक खेत में छोटे से पत्थर को खुदाई कर निकाला गया और उसके बाद उसे सीता माता के रूप में पूजा गया। मेले में सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी।
यह ब्लाक कोट के फलस्वाड़ी गांव में रामायण की एक महान घटना को उद्घाटित करता है। सीता माता का धरती में समाने की घटना की इस अनूठी परंपरा को फलस्वाड़ी, कोटसाड़ा व देवलगांव के लोग निभाते हैं। मेला मंगलवार रात से तीनों गांवों में शुरू हुआ। ढोल-दमाऊं की घमक के साथ तीनों गांव रातभर पांडव नृत्य में लीन रहे। बुधवार सुबह कोटसाड़ा गांव में दोण-कंडी सजाई गई और ग्रामीण दोण (आटे या चावल से भरा बैग) व कंडी लेकर देवल गांव पहुंचे। यहां प्राचीन मंदिर देवल समूह में ध्वजा व निसाण लेकर दोनों गांव के ग्रामीण नाचते हुए फलस्वाडी गांव के सीता माता मंदिर पहुंचे। पूरे उत्साह के साथ ही एक खेत में एक विशेष पत्थर की तलाश की गई। गोल पत्थर मिलते ही उसकी सीता माता के रूप में पूजा अर्चना की गई। उसके बाद पत्थर को धरती में समाने की परंपरा पूरी की गई। इस दौरान एक रस्सी को पकड़ कर खींचतान हुई। रस्सी को सीता की चोटी के रूप मान्यता है। रस्सी को प्रसाद स्वरूप मेलार्थियों को बांट दिया गया। इसी के साथ यह अनूठा मेला विदा हुआ। मेला समिति के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह, ब्लाक प्रमुख कोट सुनील लिंगवाल, ग्राम प्रधान कोटसाड़ा रुचि, नितिन उप्रेती, तामेश्वर आर्य, नवल किशोर व कैलाश बिष्ट आदि मौजूद रहे।
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यह ब्लाक कोट के फलस्वाड़ी गांव में रामायण की एक महान घटना को उद्घाटित करता है। सीता माता का धरती में समाने की घटना की इस अनूठी परंपरा को फलस्वाड़ी, कोटसाड़ा व देवलगांव के लोग निभाते हैं। मेला मंगलवार रात से तीनों गांवों में शुरू हुआ। ढोल-दमाऊं की घमक के साथ तीनों गांव रातभर पांडव नृत्य में लीन रहे। बुधवार सुबह कोटसाड़ा गांव में दोण-कंडी सजाई गई और ग्रामीण दोण (आटे या चावल से भरा बैग) व कंडी लेकर देवल गांव पहुंचे। यहां प्राचीन मंदिर देवल समूह में ध्वजा व निसाण लेकर दोनों गांव के ग्रामीण नाचते हुए फलस्वाडी गांव के सीता माता मंदिर पहुंचे। पूरे उत्साह के साथ ही एक खेत में एक विशेष पत्थर की तलाश की गई। गोल पत्थर मिलते ही उसकी सीता माता के रूप में पूजा अर्चना की गई। उसके बाद पत्थर को धरती में समाने की परंपरा पूरी की गई। इस दौरान एक रस्सी को पकड़ कर खींचतान हुई। रस्सी को सीता की चोटी के रूप मान्यता है। रस्सी को प्रसाद स्वरूप मेलार्थियों को बांट दिया गया। इसी के साथ यह अनूठा मेला विदा हुआ। मेला समिति के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह, ब्लाक प्रमुख कोट सुनील लिंगवाल, ग्राम प्रधान कोटसाड़ा रुचि, नितिन उप्रेती, तामेश्वर आर्य, नवल किशोर व कैलाश बिष्ट आदि मौजूद रहे।
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