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दर्द: जलजनित बीमारी ने छीनी दो परिवारों की खुशियां, इकलौते बेटे की मौत से बदहवास ईजा; बेटियों को मां का इंतजार

Wed, 16 Sep 2026 11:09 AM IST
Heera आदर्श सिंह
आदर्श सिंह Published by: Heera Updated Wed, 16 Sep 2026 11:09 AM IST
सार

ज्योलीकोट में जलजनित बीमारी ने दो परिवारों को तबाह कर दिया। एक परिवार ने 16 साल के इकलौते बेटे को खोया, जबकि दूसरे परिवार में बेटियों के सिर से मां का साया उठ गया। इलाज में परिवारों की जमा-पूंजी खत्म हो गई अब मातम के बीच आर्थिक संकट परेशान कर रहा है।

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Waterborne disease robs two families of their happiness in jeolikot
मृतका नीमा जोशी की बेटियां लक्ष्मी और खुशी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जिन घरों में बच्चों की हंसी और मां की ममता से जिंदगी गुलजार थी वहां अब सन्नाटा के बीच सिसकियों और उन यादों का बोझ है जिन्हें चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता। ज्योलीकोट क्षेत्र में जलजनित बीमारी ने दो परिवारों से दो जिंदगियां छीन लीं। एक परिवार ने 16 साल के इकलौते बेटे को खोया तो दूसरी जगह दो बेटियों के सिर से मां का साया उठ गया। इलाज के दौरान सांसें बचाने की कोशिश में परिवारों की जमा-पूंजी खप गई और अब मातम के बीच आर्थिक संकट भी सिर उठाने लगा है।

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बेटे के साथ खत्म हो गईं उम्मीदें
16 वर्षीय रीतेश को बचाने की हर कोशिश के बाद जब उसकी मौत हुई तो परिवार की सारी उम्मीदें भी जैसे उसी के साथ टूट गईं। पिता उमेश जीना किसी तरह खुद को संभालकर लोगों से बात कर लेते हैं लेकिन मां इंद्रा जीना बेटे अब भी सदमे में हैं। छोटी सी नौकरी करने वाले उमेश 12वीं में पढ़ने वाले बेटे की के बेहतर भविष्य के लिए लगातार संघर्ष कर रहे थे। परिवार ने कभी नहीं सोचा था कि जिस बेटे के सपनों को पूरा करने के लिए वे दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, उसे इतनी कम उम्र में खोना पड़ेगा। 99 वर्षीय दादा रघुवर सिंह जीना भी पोते की मौत से टूट गए हैं। परिवार के अनुसार उन्होंने रितेश के इलाज में अपनी पूरी बचत लगा दी। लोगों से कर्ज लेकर छह लाख रुपये से अधिक खर्च किए लेकिन घर के चिराग को नहीं बचा सके।

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मां चली गई, बेटियों की आंखों में अब भी इंतजार
जलजनित बीमारी के कारण असमय काल का ग्रास बनी नीमा जोशी अपने पीछे चार वर्षीय खुशी और डेढ़ वर्षीय लक्ष्मी को छोड़ गईं। दोनों बच्चियां अभी इतनी छोटी हैं कि उन्हें मौत का मतलब भी ठीक से समझ नहीं आता। उन्हें बस इतना पता है कि उनकी मां अब उनके पास नहीं है। दोनों बच्चियां आज भी घर में नीमा तलाशती हैं। पिता नीरज जोशी बताते हैं कि सोने के समय दोनों मां को पुकारती हैं। कभी नाराज होती हैं, कभी जोर-जोर से चिल्लाती हैं और आखिरकार रोते-रोते सो जाती हैं। वह बताते हैं कि पत्नी की जान बचाने के लिए करीब पांच लाख रुपये खर्च कर दिए। इसके लिए उनकी जमापूंजी तो खर्च हुई ही, लोगों से कर्ज भी लेना पड़ा। इसके बावजूद पत्नी को बचाया नहीं जा सकता।

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