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उत्तराखंड का सियासी संकट : भष्ट्राचार पर हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
अमर उजाला ब्यूरो, नैनीताल
Updated Tue, 19 Apr 2016 10:25 PM IST
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हाईकोर्ट के अधिवक्ता
- फोटो : अमर उजाला
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उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने, बागी विधायकों की सदस्यता समाप्त करने तथा वित्त विधेयक को लेकर दायर की गई याचिकाओं पर मंगलवार को भी बहस हुई। इस दौरान संबंधित पक्षों की पैरवी करने आए देश के जाने-माने वकीलों ने एक दूसरे के पक्षों पर गंभीर आरोप लगाए। सुनवाई के दौरान देश में गहरी जडे़ं जमा चुके भ्रष्टाचार पर कोर्ट भी बेहद नाराज नजर आई।
भ्रष्टाचार पर कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए यहां तक कहा कि यदि भ्रष्टाचार के मामले में सरकारों पर कार्रवाई होने लगे तो देश की कोई भी सरकार पांच साल तो क्या पांच मिनट भी नहीं टिक सकती। कोर्ट ने इस मुद्दे को महत्वपूर्ण मानते हुए तथा दोनों पक्षों की सहमति के बाद इस प्रकरण पर महावीर जयंती के अवकाश के बावजूद बुधवार को लगातार तीसरे दिन भी बहस जारी रखने के निर्देश दिए।
मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की संयुक्त खंडपीठ के समक्ष मंगलवार को भी पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और अन्य की उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने और बजट अध्यादेश के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई। हाईकोर्ट में राष्ट्रपति शासन और बजट अध्यादेश के खिलाफ दायर याचिकाओं पर भारत के अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने बहस की।
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इसके बाद राज्यपाल के निर्णय के संबंध में पैरवी करने पहुंचे वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने न्यायालय से कहा कि हॉर्स ट्रेडिंग के पुख्ता सबूत होने से मामले की गंभीरता स्पष्ट होती है। साथ ही सदन में बिल गिरना भी सरकार के खिलाफ एक महत्वपूर्ण तथ्य है। उन्होंने कहा कि ऐसे में यदि राष्ट्रपति चाहते तो भ्रष्टाचार के इतने सबूत होने पर सीधे विधानसभा भंग करके चुनाव कराने की संस्तुति भी कर सकते थे। न्यायालय ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि भ्रष्टाचार के आरोप में सरकारों पर कार्रवाई होने लगे तो देश की कोई भी सरकार 5 साल तो क्या 5 मिनट भी नहीं टिक सकती।
कोर्ट में किसने क्या कहा
अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी : फिलहाल यह एक अस्थायी व्यवस्था है। स्थितियों को चर्चा के लिए संसद के आगामी सत्र में रखा जाएगा जो आगामी सोमवार से प्रारंभ हो रहा है। स्पीकर ने असंवैधानिक सरकार को बने रहने दिया। क्या हम हॉर्स ट्रेडिंग पर अपनी आंखें बंद कर लें जो अब सीएफएसएल (केंद्रीय फारेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला) से प्रमाणित भी हो चुकी है। स्पीकर ने नियम 296 का पालन नहीं किया। बिल प्रोसीडिंग वास्तव में फ्लोर टेस्ट ही है जिसमें सरकार फेल रहीं।
इस पर कोर्ट ने कहा : लेकिन राज्यपाल ने तो बिल प्रोसीडिंग को फ्लोर टेस्ट नहीं माना था। इसलिए उन्होंने 28 मार्च तक फ्लोर टेस्ट के निर्देश दिए और राज्यपाल को व्यक्तिगत रूप से यह जानकारी नहीं थी कि विधानसभा में 18 मार्च को क्या हुआ। यदि 35 विधायकों ने उस शाम उनसे शिकायत की थी तो उनके सामने एक मात्र विकल्प फलोर टेस्ट के निर्देश देने का ही था।
राज्य की ओर से हरीश साल्वे : धारा 356 का उद्देश्य केवल सुधारात्मक है न कि प्रताड़ित करना। इस पर कोर्ट ने कहा कि क्या अयोग्य ठहराए गए विधायकों को देखते हुए केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लगाने में जल्दबाजी नहीं की।
हरीश साल्वे : केंद्र सरकार के पास हॉर्स ट्रेडिंग का पर्याप्त साक्ष्य था।
कोर्ट : यदि भ्रष्टाचार को आधार माना जाए तो भारत की कोई भी सरकार पांच मिनट भी नहीं टिक सकती। हम सब भ्रष्टाचार की बातें करते हैं लेकिन हमने इसके लिए किया क्या है।
याचिका में क्या-क्या
राष्ट्रपति ने 31 मार्च को अध्यादेश जारी किया था जिसके तहत उत्तराखंड के वित्त विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पारित कर दिया।
वित्त विधेयक को उत्तराखंड विधानसभा पूर्व में ही पारित कर चुकी है उसको केंद्र सरकार पुन: पारित नहीं कर सकती।
वित्त विधेयक विधानसभा में पारित हुआ या नहीं हुआ इसका निर्णय केवल विधानसभा अध्यक्ष ही कर सकता है।
अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी की दलील
स्पीकर सदन के दौरान 35 विधायकों की मतविभाजन की मांग को नजरअंदाज नहीं कर सकते थे लेकिन हुआ ऐसा ही
18 मार्च को कोई वोटिंग नहीं हुई। जब वोटिंग ही नहीं हुई तो बिल कैसे पास हो सकता है क्योंकि सरकार बहुमत खो चुकी थी।
पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा विधायकों की खरीद फरोख्त की जा रही थी, जिसका स्टिंग भी टीवी चैनलों के माध्यम से दिखाया गया था। इसके बाद राष्ट्रपति शासन लगाना आवश्यक हो गया था।
राज्य की संवैधानिक विफलता के कारण 18 मार्च को सरकार गिर गई थी और विनियोग विधेयक पास नहीं हो सका था जिस कारण राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना एकमात्र विकल्प था।
एक अप्रैल से नया वित्तीय वर्ष शुरू होने से राज्य का बजट पास नहीं हुआ था। अत: केंद्र सरकार को उत्तराखंड को वित्तीय संकट से बचाने के लिए बजट अध्यादेश लाना पड़ा।
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भ्रष्टाचार पर कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए यहां तक कहा कि यदि भ्रष्टाचार के मामले में सरकारों पर कार्रवाई होने लगे तो देश की कोई भी सरकार पांच साल तो क्या पांच मिनट भी नहीं टिक सकती। कोर्ट ने इस मुद्दे को महत्वपूर्ण मानते हुए तथा दोनों पक्षों की सहमति के बाद इस प्रकरण पर महावीर जयंती के अवकाश के बावजूद बुधवार को लगातार तीसरे दिन भी बहस जारी रखने के निर्देश दिए।
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मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की संयुक्त खंडपीठ के समक्ष मंगलवार को भी पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और अन्य की उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने और बजट अध्यादेश के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई। हाईकोर्ट में राष्ट्रपति शासन और बजट अध्यादेश के खिलाफ दायर याचिकाओं पर भारत के अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने बहस की।
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इसके बाद राज्यपाल के निर्णय के संबंध में पैरवी करने पहुंचे वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने न्यायालय से कहा कि हॉर्स ट्रेडिंग के पुख्ता सबूत होने से मामले की गंभीरता स्पष्ट होती है। साथ ही सदन में बिल गिरना भी सरकार के खिलाफ एक महत्वपूर्ण तथ्य है। उन्होंने कहा कि ऐसे में यदि राष्ट्रपति चाहते तो भ्रष्टाचार के इतने सबूत होने पर सीधे विधानसभा भंग करके चुनाव कराने की संस्तुति भी कर सकते थे। न्यायालय ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि भ्रष्टाचार के आरोप में सरकारों पर कार्रवाई होने लगे तो देश की कोई भी सरकार 5 साल तो क्या 5 मिनट भी नहीं टिक सकती।
कोर्ट में किसने क्या कहा
अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी : फिलहाल यह एक अस्थायी व्यवस्था है। स्थितियों को चर्चा के लिए संसद के आगामी सत्र में रखा जाएगा जो आगामी सोमवार से प्रारंभ हो रहा है। स्पीकर ने असंवैधानिक सरकार को बने रहने दिया। क्या हम हॉर्स ट्रेडिंग पर अपनी आंखें बंद कर लें जो अब सीएफएसएल (केंद्रीय फारेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला) से प्रमाणित भी हो चुकी है। स्पीकर ने नियम 296 का पालन नहीं किया। बिल प्रोसीडिंग वास्तव में फ्लोर टेस्ट ही है जिसमें सरकार फेल रहीं।
इस पर कोर्ट ने कहा : लेकिन राज्यपाल ने तो बिल प्रोसीडिंग को फ्लोर टेस्ट नहीं माना था। इसलिए उन्होंने 28 मार्च तक फ्लोर टेस्ट के निर्देश दिए और राज्यपाल को व्यक्तिगत रूप से यह जानकारी नहीं थी कि विधानसभा में 18 मार्च को क्या हुआ। यदि 35 विधायकों ने उस शाम उनसे शिकायत की थी तो उनके सामने एक मात्र विकल्प फलोर टेस्ट के निर्देश देने का ही था।
राज्य की ओर से हरीश साल्वे : धारा 356 का उद्देश्य केवल सुधारात्मक है न कि प्रताड़ित करना। इस पर कोर्ट ने कहा कि क्या अयोग्य ठहराए गए विधायकों को देखते हुए केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लगाने में जल्दबाजी नहीं की।
हरीश साल्वे : केंद्र सरकार के पास हॉर्स ट्रेडिंग का पर्याप्त साक्ष्य था।
कोर्ट : यदि भ्रष्टाचार को आधार माना जाए तो भारत की कोई भी सरकार पांच मिनट भी नहीं टिक सकती। हम सब भ्रष्टाचार की बातें करते हैं लेकिन हमने इसके लिए किया क्या है।
याचिका में क्या-क्या
राष्ट्रपति ने 31 मार्च को अध्यादेश जारी किया था जिसके तहत उत्तराखंड के वित्त विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पारित कर दिया।
वित्त विधेयक को उत्तराखंड विधानसभा पूर्व में ही पारित कर चुकी है उसको केंद्र सरकार पुन: पारित नहीं कर सकती।
वित्त विधेयक विधानसभा में पारित हुआ या नहीं हुआ इसका निर्णय केवल विधानसभा अध्यक्ष ही कर सकता है।
अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी की दलील
स्पीकर सदन के दौरान 35 विधायकों की मतविभाजन की मांग को नजरअंदाज नहीं कर सकते थे लेकिन हुआ ऐसा ही
18 मार्च को कोई वोटिंग नहीं हुई। जब वोटिंग ही नहीं हुई तो बिल कैसे पास हो सकता है क्योंकि सरकार बहुमत खो चुकी थी।
पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा विधायकों की खरीद फरोख्त की जा रही थी, जिसका स्टिंग भी टीवी चैनलों के माध्यम से दिखाया गया था। इसके बाद राष्ट्रपति शासन लगाना आवश्यक हो गया था।
राज्य की संवैधानिक विफलता के कारण 18 मार्च को सरकार गिर गई थी और विनियोग विधेयक पास नहीं हो सका था जिस कारण राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना एकमात्र विकल्प था।
एक अप्रैल से नया वित्तीय वर्ष शुरू होने से राज्य का बजट पास नहीं हुआ था। अत: केंद्र सरकार को उत्तराखंड को वित्तीय संकट से बचाने के लिए बजट अध्यादेश लाना पड़ा।