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पंचायत चुनाव: न तो आरक्षण में विशेष दोहराव न ही धारा 243 का उल्लंघन हुआ प्रमाणित, यह कहता है अनुच्छेद 243

Sat, 28 Jun 2025 02:57 PM IST
हीरा मेहरा गिरीश रंजन तिवारी
गिरीश रंजन तिवारी Published by: हीरा मेहरा Updated Sat, 28 Jun 2025 02:57 PM IST
सार

राज्य में पंचायत चुनावों पर हुई दर्जनों शिकायतों पर हाईकोर्ट में पांच दिन चली सुनवाई के बाद न तो आरक्षण में विशेष दोहराव पाया गया न ही धारा संविधान के अनुच्छेद 243 के उल्लंघन का आरोप सही निकला।

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Uttarakhand Panchayat Elections:Neither special duplication in reservation nor violation of section 243 proved
पंचायत चुनाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राज्य में पंचायत चुनावों पर हुई दर्जनों शिकायतों पर हाईकोर्ट में पांच दिन चली सुनवाई के बाद न तो आरक्षण में विशेष दोहराव पाया गया न ही धारा संविधान के अनुच्छेद 243 के उल्लंघन का आरोप सही निकला। जबकि इस बात की बड़ी चर्चा थी कि आरक्षण निर्धारण में भारी मनमानी हुई है।

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ऐसे में ख्वाजा हैदर अली आतिश की गजल का प्रसिद्ध शेर बिल्कुल सटीक बैठता है, जिसमें उन्होंने कहा है- ‘बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का जो चीरा तो इक कतरा-ए-खूं न निकला।’ पंचायत चुनाव को लेकर सबसे बड़ा आरोप था कि बड़ी संख्या में सीटों के आरक्षण का दोहराव है, जिससे बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि चुनाव लड़ने से वंचित हो गए हैं। साथ ही कहा गया था कि आरक्षण निर्धारण में भारत के संविधान के अनुच्छेद 243 डी का उल्लंघन हुआ है।

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इस आरोप के साथ अन्य आपत्तियां लगाते हुए याचिकाएं दाखिल हुईं। याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश जी नरेन्दर और जस्टिस आलोक मेहरा की पीठ ने 23 जून को चुनावों पर रोक लगाते हुए तब से 27 जून तक लगातार पूरी गंभीरता से सुनवाई की। शुक्रवार को सुनवाई की समाप्ति के बाद हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्ग की सीटों के संबंध में उत्तराखंड की जिला पंचायत सदस्य की 358 सीटों में से केवल आठ सीटों में आरक्षण का दोहराव हुआ है, जिनमें जिला पंचायत चमोली में एक, जिला पंचायत बागेश्वर में दो, जिला पंचायत ऊधमसिंह नगर में दो, जिला पंचायत नैनीताल में एक, जिला पंचायत उत्तरकाशी में एक और जिला पंचायत चंपावत में एक सीट पर पुनरावृत्ति हुई है। साथ ही कुल सीटों की तुलना में पुनरावृत्ति की संख्या नगण्य है।

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कोर्ट ने कहा कि यह तथ्य भी सामने आया कि परिसीमन पर भी कार्य किया गया है और कुछ नई पंचायतों का भी गठन किया गया है। कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का रोटेशन अनुच्छेद 243-डी के अनुरूप है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने नियम 4 (4) की वैधता और महिला सीटों का आरक्षण (सामान्य श्रेणी) को 50 फीसदी कोटे के भीतर रखे जाने का मामला भी उठाया है, लेकिन फिलहाल कोर्ट इन आपत्तियों से प्रभावित नहीं है।


एडवोकेट जनरल एसएन बाबुलकर और मुख्य स्थायी अधिवक्ता चंद्रशेखर रावत व उनकी टीम की प्रभावी पैरवी से सहमत कोर्ट ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस न्यायालय ने प्रथम दृष्टया यह निष्कर्ष निकाला है कि अनुच्छेद 243-डी के प्रावधानों का पर्याप्त अनुपालन किया गया। इसके बाद 23 जून को दिए गए अंतरिम आदेश को जारी नहीं रखा जा सकता और चुनाव प्रक्रिया को उसी चरण से जारी रखा जाए जहां उसे इस न्यायालय की ओर से रोक दिया गया था।

यह कहता है अनुच्छेद 243
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243डी अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और महिलाओं के लिए पंचायतों (ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन निकाय) में सीटों के आरक्षण को अनिवार्य बनाता है। इसके तहत विशेष रूप से यह आवश्यक है कि प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष चुनाव से भरी जाने वाली सीटों तथा अध्यक्ष पद की कुल सीटों में से महिलाओं के लिए कम से कम एक तिहाई सीटें आरक्षित हों।

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