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परंपरा को जीवंत रखने को बच्चों को सिखा रहे हुनर
ब्यूरो /अमर उजाला, नैनीताल।
Updated Tue, 22 Sep 2015 01:41 AM IST
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मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर के एक ही स्थान पर होने के चलते सरोवर नगरी यूं तो कई दशकों से लोगों को सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दे रही है।
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इसके इतर कई लोग ऐसे भी हैं जो निजी प्रयासों से भी नगर के सांप्रदायिक सौहार्द को बनाए रख जनसंदेश दे रही है। ऐसा ही एक नाम है मुन्नन मियां। जो पिछले 23 साल से नंदा देवी के आकर्षक डोले का निर्माण कर रहे हैं।
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मैया का डोला निर्माण कर रहे मोहम्मद मुन्नन सैफी ने बताया कि मूल रूप से वह संभल (मुरादाबाद) के रहने वाले हैं। 1968 में वह नैनीताल आ गए। तभी से बढ़ई का काम कर परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं।
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यहां आने के बाद से ही वह नंदा देवी महोत्सव में अपनी छोटी सी सहभागिता करते थे। वर्ष 1992 में उन्होंने सभा पदाधिकारियों के कहने पर डोले को भव्य रूप दिया।
इसके बाद उन्होंने डोले के बाहर पूजन और पंडितों के लिए बनने वाले बड़ा (फोल्डिंग) मंडप भी बनाया। कहा कि प्रतिवर्ष व बाहरी फोल्डेड मंडप को उतारकर रखते हैं।
मंडप निर्माण से पूर्व पॉलिस आदि करने के बाद फिर इसे स्थापित किया जाता है। मैया के डोले में भी वह प्रतिवर्ष पॉलिस करते हैं।
मु्न्नन ने बताया कि पूर्व में श्रद्धालु मैया के डोल के पीछे शेर की प्रतिमा को देखते थे, लेकिन इस वर्ष उन्हें शेर पर मैया भी विराजमान नजर आएंगी।
यह कारीगरी पीतल की चादर में नक्कासी से उभार बनाकर की गई है। मुन्नन ने कहा कि यह परंपरा जीवित रहे, इसके लिए वे अपने बेटे मो. मुजाहिद, मो. फैजान और मो. मुनाजिर को भी यह हुनर सिखा रहे हैं। उनका मानना है कि जब दुनिया बनाने वाला एक है तो फिर उसे मैया कहकर पूजो या फिर मोहम्मद।