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सेनापति को सियासी शह दे रहा है सिपाही
अमरनाथ्ा
Updated Thu, 09 Feb 2017 01:47 AM IST
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जिला परिषद चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
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समुद्र तल से लगभग 1700 फीट की ऊंचाई पर यहां सर्द मौसम में इन दिनों सियासत गर्म है। सियासी बिसात पर कभी भाजपा के सिपाही रहे एक नेता ने भाजपा के ही सेनापति को शह देकर चिंता बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र भतरौंजखान में भी कांग्रेस और भाजपा दोनों के वोट बैंक में सेंधमारी के आसार हैं।
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वैसे तो इस हॉट सीट पर पांच प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन मुख्य रूप में वोट बैंक तीन खानों में बंटते दिख रहे हैं। रानीखेत विधानसभा में बेरोजगारी, जंगली जानवरों का आतंक, बदहाल स्वास्थ्य-शिक्षा व्यवस्था जैसी कई समस्याएं अब भी मुंह बाये हुए हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश चुनावों में ये समस्याएं कभी जीत-हार का मुद्दा नहीं बनतीं।
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भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और चुनाव समिति के अध्यक्ष अजय भट्ट पांचवीं बार विधायक बनने के लिए मैदान में उतरे हैं। पिछली बार वह मात्र 56 मतों से चुनाव जीते थे। इस बार उनकी राह में भाजयुमो के उपाध्यक्ष रहे निर्दलीय उम्मीदवार प्रमोद नैनवाल रोड़ा बने हुए हैं।
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दोनों के ब्राह्मण होने के चलते भी वोट बंटते दिखते रहे हैं। हालांकि अजय भट्ट अपने क्षेत्र में खुद के कराए काम और केंद्र सरकार की उपलब्धियों के आधार पर वोट मांग रहे हैं, पर उनके क्षेत्र में कम आने से लोगों में नाराजगी है।
अजय भट्ट कांग्रेस सरकार पर रानीखेत जिला न बनाने के साथ-साथ भय और भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस उम्मीदवार करन माहरा के पक्ष में वोट जुटाने के लिए जहां सीएम हरीश रावत खुद जुटे हुए हैं, वहीं अजय भट़्ट इस चुनावी समरभूमि में अकेले लड़ते दिख रहे हैं।
अभी तक कोई भी स्टार प्रचारक उनके पक्ष में वोट मांगने नहीं आया है। भाजपा सेनापति को अब मोदी लहर से उम्मीद है। सीएम के रिश्तेदार कांग्रेस उम्मीदवार माहरा तीसरी बार चुनाव में उतरे हैं। वह पिछली बार बहुत कम मतों के अंतर से चुनाव हारे थे।
इस बार विकास के क्षेत्र में प्रदेश सरकार की उपलब्धियां गिनाकर और सबकी चाहत हरीश रावत के नारे के साथ वोट मांग रहे हैं। वह विधायक की कुर्सी कब्जाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं, पर भतरौंजखान में भितरघात से चुनावी समीकरणों पर असर पड़ता दिख रहा है।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस क्षेत्र के 10 हजार वोटों में सेंधमारी किस हद तक होती है, दिग्गजों की जीत-हार इससे प्रभावित हो सकती है। कांग्रेस के इस गढ़ में नैनवाल की सेंधमारी के कुछ हद तक प्रभावी होने के आसार हैं। नैनवाल की पत्नी यहां से ब्लॉक प्रमुख हैं।
मतदाताओं में भले ही खामोशी हैं, लेकिन पहली बार चुनाव मैदान में उतरे निर्दलीय उम्मीदवार नैनवाल ने नशा हटाओ, पलायन रोको और पहाड़ बचाओ का नारा देकर युवाओं और मातृशक्ति को अपनी ओर खींचने की कोशिश की है।
हालांकि, नैनवाल रानीखेत में उतने प्रभावी नहीं हैं, यह भाजपा और कांग्रेस के लिए राहत की बात है, लेकिन बताया जाता है कि बीजेपी का एक खेमा उन्हें सपोर्ट कर रहा है। नैनवाल इससे इनकार करते हैं। उनके मैदान में टिके रहने से भाजपा और कांग्रेस के दिग्गजों की चिंता बढ़ गई है।
दूसरी तरफ बसपा और उक्रांद का जनाधार लगातार घट रहा है। दोनों पार्टियों ने इस बार नए उम्मीदवार को मौका दिया है। जानकारों का मानना है कि इस बार बसपा का प्रत्याशी दमदार नहीं है, इसलिए उसका वोट बैंक बंटने के आसार हैं। ऐसे में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच होता दिख रहा है। अब देखना है कि 15 फरवरी को कौन कितना वोट बटोरने में कामयाब रहता है।