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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Nainital News ›   The district sought to be politicized voters are not able to digest

जिले की मांग का राजनीतिकरण किया जाना पचा नहीं पा रहे हैं मतदाता

Fri, 26 Aug 2016 11:53 PM IST
नवीन भट्ट/सुधाकर भट्ट
नवीन भट्ट/सुधाकर भट्ट Updated Fri, 26 Aug 2016 11:53 PM IST
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नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट और मुख्यमंत्री हरीश रावत के करीबी करन माहरा की मौजूदगी वाली रानीखेत विधानसभा इस बार कांग्रेस और भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। मतदाता महसूस करने लगे हैं कि जिले की सालों पुरानी मांग का राजनीतिकरण किया जा रहा है।

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एक ही विधानसभा से दो जिलों की मांग के कारण कांग्रेस-भाजपा भी बुरी तरह से उलझी गई हैं। ऐसे मेें मतदाता अंदरखाने विकल्प की तलाश में भी हैं और कोई दमदार प्रत्याशी मिला तो कांग्रेस-भाजपा के लिये परिणाम अप्रत्याशित भी हो सकते हैं।
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रानीखेत विधानसभा की सूरत 2012 में हुए परिसीमन के बाद बदल गई थी। उस समय खत्म कर दी गई भिकियासैंण की विधानसभा को रानीखेत में मिलाया गया। भिकियासैंण का यह इलाका रामगंगा कहलाता है और यहां लंबे समय से अलग जिले की मांग है। इसी तरह रानीखेत को जिला बनाने की मांग 1957 से चली आ रही है और इसको लेकर कई आंदोलन भी हो चुके हैं।
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एक ही विधानसभा से दो जिलों की मांग में कांग्रेस और भाजपा भी उलझ गई है। रमेश पोखरियाल निशंक के मुख्यमंत्री रहते हुए रानीखेत में भिकियासैंण को मिलाकर जिला बनाने की घोषणा हु़ई थी।

नेता प्रतिपक्ष अजय भट़्ट इसी घोषणा के सहारे चुनावी नैया पार लगाने की कोशिश में हैं। मुसीबत यह है कि करीब 40 हजार मतदाताओं का रामगंगा क्षेत्र इसके लिए तैयार नहीं है। अजय भट्ट कह रहे हैं कि रामगंगा क्षेत्र के लोगों को समझा लिया जाएगा।

कांग्रेस के पूर्व विधायक करन माहरा का तो रुख ही अलहदा है। करन माहरा दोनों क्षेत्रों को मिलाकर एक जिला बनाने की पैरवी करते हुए ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन जिला मुख्यालय बनाने की बात कर रहे हैं।

इस मांग को लेकर वे मुख्यमंत्री हरीश रावत से भी मिल चुके हैं। हालांकि, लोग करन माहरा के इस फार्मूले को भी पचा नहीं पा रहे हैं। इस समय अजय भट्ट और करन माहरा दोनों ही गांवों की ओर रुख किए हुए हैं। कांग्रेस-भाजपा की इस ढाई चाल से आजिज आए मतदाता अब अंदरखाने विकल्प की तलाश में भी हैं।

व्यक्तिगत छवि से ही सही पर बसपा के प्रत्याशी पूरन सिंह डंगवाल ने पिछले दो चुनावोें में दमदार उपस्थिति दर्ज कराई थी। डंगवाल के बहाने बसपा के वोट बैंक में खासा इजाफा हुआ।


डंगवाल के निधन के कारण बसपा ने इस बार के चुनाव के लिए अपना प्रत्याशी खो दिया है और यह दोनों बाकी दलों के लिए कुछ हद तक मुफीद भी है। असल चाबी मतदाताआें के पास है और मतदाता हैं कि कह रहे हैं कि सौ किलोमीटर दूर अल्मोड़ा कब तक दौड़ाओगे।

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