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कोसी बैराज पहुंचने लगे सुर्खाब
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रामनगर (नैनीताल)। कश्मीर, नेपाल और लद्दाख में बर्फ गिरने की वजह से सुर्खाब रामनगर के कोसी बैराज पहुंचने लगे हैं। जल्द ही और पक्षी यहां आकर कोसी बैराज की शोभा बढ़ाएंगे।
सुर्खाब यहां हर साल जाड़ों में शीतकाल़ीन प्रवास के लिए आते हैं। इस बार समय से बारिश और बर्फबारी होने से से ठंड बढ़ने के कारण इनका आगमन समय से पहले हुआ है जो अमूमन नवंबर के पहले सप्ताह से होता था। वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर दीप रजवार ने बताया कि इन्हें चकवा, चकवी, कोक, नग, लोहित, चक्रवात, केसर आदि नामों से भी जाना जाता है। पक्षीप्रेमी इन्हें ब्राह्मणी डक व रूडी शेल्डक के नाम से भी जानते हैं। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने इनका वर्णन किया है। यह एक जलमुर्गी है जो तालाब, जलाशय और नदियों में रहना पसंद करते है।
ये जोड़ों में रहने हैं इनका जोड़ा जिंदगी भर के लिए होता है। शर्मीले स्वभाव के ये पक्षी काफी चौकन्ने होते हैं। हल्की सी आहट होने पर भी उड़ जाते है। ये अपना घोंसला पानी से हटकर चट्टानों की दरारों और पेड़ों पर बनाते हैं। पक्षी प्रेमी हर साल इनका बेसब्री से इंतजार करते है। सुर्खाब का मुख्य भोजन घास फूस, जड़ काई, छोटे मेढक, कीड़े, मकोड़े है। सुर्खाब के शिकार पर पूर्णत: प्रतिबंध है। वन्यजीव अधिनियम की धारा 1973 (2003) के तहत इन्हें पूर्ण संरक्षण प्राप्त है।
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सुर्खाब यहां हर साल जाड़ों में शीतकाल़ीन प्रवास के लिए आते हैं। इस बार समय से बारिश और बर्फबारी होने से से ठंड बढ़ने के कारण इनका आगमन समय से पहले हुआ है जो अमूमन नवंबर के पहले सप्ताह से होता था। वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर दीप रजवार ने बताया कि इन्हें चकवा, चकवी, कोक, नग, लोहित, चक्रवात, केसर आदि नामों से भी जाना जाता है। पक्षीप्रेमी इन्हें ब्राह्मणी डक व रूडी शेल्डक के नाम से भी जानते हैं। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने इनका वर्णन किया है। यह एक जलमुर्गी है जो तालाब, जलाशय और नदियों में रहना पसंद करते है।
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ये जोड़ों में रहने हैं इनका जोड़ा जिंदगी भर के लिए होता है। शर्मीले स्वभाव के ये पक्षी काफी चौकन्ने होते हैं। हल्की सी आहट होने पर भी उड़ जाते है। ये अपना घोंसला पानी से हटकर चट्टानों की दरारों और पेड़ों पर बनाते हैं। पक्षी प्रेमी हर साल इनका बेसब्री से इंतजार करते है। सुर्खाब का मुख्य भोजन घास फूस, जड़ काई, छोटे मेढक, कीड़े, मकोड़े है। सुर्खाब के शिकार पर पूर्णत: प्रतिबंध है। वन्यजीव अधिनियम की धारा 1973 (2003) के तहत इन्हें पूर्ण संरक्षण प्राप्त है।
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